मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/57
है, जो उत्पादित वस्तु मूल्य की सदुपयोगिता है, यह प्रमाण सिद्ध है।
अशिष्टता में उत्पादित वस्तु मूल्य का नियंत्रित व समाविष्ट होना संभव नहीं है क्योंकि अशिष्टता कोई मूल्य नहीं है। वह केवल अजागृति, अज्ञान, असमर्थता का ही द्योतक है। गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया रहता है। इस सिद्धांत के अनुसार मूल्य विहीन अशिष्टता में उत्पादित वस्तु का मूल्य समाविष्ट होना संभव ही नहीं है। शिष्टता विहीन समाज, सामाजिकता, शिक्षा एवं व्यवस्था भी जनवादीय नहीं है। जनवादीय चिंतन का आधार ही शिष्टता है।
12.
न्याय पाना, सही कार्य व्यवहार करना एवं सत्य सम्पन्नता ही साम्यतः जनाकाँक्षा है।
जब तक न्याय के संदर्भ में जन-मन गत मतभेद हैं, तब तक व्यवहारात्मक जनवाद नहीं है। व्यवहारिकता के विपरीत में अव्यवहारिकता ही दृष्टव्य है। यही विषमता, मतभेद, द्रोह-विद्रोह, आतंक, भय, संचय, वर्ग संघर्ष एवं युद्ध है या युद्ध के लिये तत्परता है। ये सब मानव के समाधान एवं समृद्धि के अवरोधक तत्व हैं। अन्याय एवं गलती के बिना समस्या एवं असमृद्धि का प्रसव नहीं है। इस प्रकार से मानव ही प्रतिभा एवं व्यक्तित्व के असंतुलनवश गलती एवं अन्याय में प्रवृत्त होता है। फलतः मंगल कामना रहते हुए भी वह अमंगलकारी कर्म करता है। अमंगलकारी कर्म व्यवहार, विचार परंपरा सामाजिकता के लिये सहायक सिद्ध नहीं हुई है। यही सत्यता मानव को मंगलदायी कर्म व्यवहार विचार में अनुगमन एवं अनुशीलन करने के लिये प्रेरणा है। यही अभ्युदयशीलता के लिये उदय, मंगलमयता के लिये मार्ग, मांगलिकतापूर्ण जीवन यात्रा एवं शुभ परंपरा की घटना है।
न्याय और समाधान सार्वभौम सत्य है। यह देश काल अबाध है। इसलिये मानव द्वारा किया गया संपूर्ण विचार एवं प्रयास तर्कसंगत या सतर्कतापूर्ण होने के लिये ही प्रत्येक मानव का समाधान एवं समृद्धि में, से, के लिये ही विचार, कर्म एवं व्यवहार करना प्रसिद्ध है। तर्क की सीमा में प्रतितर्क है। मूल वस्तु के अज्ञात व अस्पष्ट रहते हुए उसके तात्पर्य या फलवत्ता के संदर्भ में की गई प्रश्नोत्तर प्रक्रिया ही वाद-प्रतिवादी एवं तर्क प्रतितर्क है, जो समस्या की परंपरा है। तर्क समाधान नहीं है। समाधान एवं तात्त्विकता के लिये तर्क का प्रयुक्त होना ही उसकी चरितार्थता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि तर्क का अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है। साथ ही तर्क का प्रयोजन केवल तात्त्विकता से संबद्ध होना ही है। इसी प्रमाण सिद्ध साक्ष्य से स्पष्ट होता है कि तर्क सीमान्तवर्ती विचार, उपदेश एवं प्रचार मानव जीवन के लिये पर्याप्त नहीं है।