मानव अभ्यास दर्शन

लाभ उत्पादन नहीं है।

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मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/63

यांत्रिकता के लिये विवशतावश अनिश्चयता एवं क्रांति विहीनता

वैयक्तिक विकास में अवरोधवश आतंक

मानव की प्रतिभा एवं व्यक्तित्व के असंतुलनवश संदिग्धता

व्यक्ति का उत्पादन पर स्वत्व एवं अधिकार विहीनतावश

जीवन में (स्वयम् में) अविश्वास एवं भय दृष्टव्य हैं।

ये सब प्रक्रियायें भ्रमित मानसिकता के आधार पर घटित हुई हैं जबकि सामाजिकता एवं सामाजिक संस्थाओं का मूल उद्देश्य भय मुक्ति प्रदायिता ही है। प्रत्येक राज्यनैतिक एवं धर्मनैतिक संस्था भय मुक्ति के लिये प्रतिनिधित्व करती हैं, साथ ही वाद-विवाद, विरोध एवं युद्ध साहित्य का संग्रह करती हैं, जो मूल उद्देश्य के लिये अनावश्यक या विरोधी सिद्ध हुई हैं। इसका निराकरण मात्र मानवीयतापूर्ण धर्म नीति एवं राज्य नीति का अनुसरण ही है।

15.

लाभ उत्पादन नहीं है।

कम प्रदाय के बदले में अधिक वस्तु व सेवा को पाना लाभ है यही शोषण का प्रत्यक्ष रूप है। जबकि श्रम नियोजन का परिणाम ही उत्पादन है जिसमें उपयोगिता एवं सुन्दरता मूल्य सिद्ध होता है। श्रम नियोजन से ही समृद्धि होती है न कि लाभ से क्योंकि मुद्रा शोषण पर आधारित वाणिज्य की सीमा में लाभ-हानि की संभावनाएं होती है। यह दोनों स्थिति उत्पादन या उत्पादन के लिये सहायक नहीं है। वाणिज्य कर्म शुद्धतः विनिमय के अर्थ में उत्पादन या उत्पादन के लिये सहायक सिद्ध होता है न कि लाभ के अर्थ में। उत्पादन प्रयास आवश्यकता पर आधारित होती है, जबकि लाभाकाँक्षित वाणिज्य कर्म मांग पर आधारित होता है। लाभाकाँक्षी वाणिज्य पद्धति में कृत्रिम अभाव की स्थिति का निर्माण किया जाता है। अभाव की कृत्रिमता के लिये वाणिज्य साधनों व वस्तुओं का शेखरीकरण (संग्रह पूर्वक वस्तुओं को अदृश्य करना)कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं में वस्तु सुलभता के संदर्भ में संदिग्धता बनाये रखना होता है, जिससे अधिक लाभ अर्जित किया जा सके। वस्तुओं की अदृश्यीकरण प्रक्रिया पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित होती है जो स्पष्ट है। इसका निराकरण केवल श्रम नियोजन एवं श्रम विनिमय पद्धति का अनुसरण है। “लाभ संग्रह होता है न कि उत्पादन।” लाभ निर्मित पूंजी ही वस्तु विनिमय में असंतुलन का प्रधान कारण