मानव अभ्यास दर्शन

विनिमय क्रिया जागृत मानव परंपरा में अनिवार्य प्रक्रिया है।

Page 65

मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/65

विकल्प केवल श्रम विनिमय पद्धति का अनुसरण ही है।

उत्पादन की भागीदारी के लिये श्रम नियोजन आवश्यक है। श्रम नियोजन पूर्वक ही मानव समृद्ध होता है। मानव में श्रम निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य के रूप में समझदारी होना ज्ञातव्य है जो चैतन्य क्रिया का अधिकार है। इसी अधिकारवश जड़ प्रकृति की यांत्रिकता में वह परिमार्जन और परिणाम प्रदान करता है फलतः उपयोगिता एवं सुन्दरता प्रत्यक्ष होती है। चैतन्य क्रिया की यही क्षमता परिवारगत आवश्यकता से अधिक उत्पादन एवं समृद्धि को प्रकट करती है। चैतन्य जीवन ही अमर है। शरीर का जन्म और मृत्यु घटना है। इस तथ्य को जानने वाला भी चैतन्य इकाई ही है। मानव में श्रम का मूल रूप भी चैतन्य क्रिया ही है। इस चैतन्य क्रिया में जो संवेदनशील एवं संज्ञानशील क्षमता है, वही स्थापित मूल्यों का वहन, शिष्ट मूल्यों का प्रकटन और उत्पादित वस्तु मूल्यों का मूल्यांकन करता है और प्रमाणित होना पाया जाता है। सामाजिक जीवन में उत्पादन, उपभोग एवं विनिमय अविभाज्य अंग है। यही तथ्य जीवन में एकसूत्रता, तारतम्यता, अनन्यता और एकात्मकता को स्थापित करने के लिये प्रेरित करता है। यही स्थापना शुद्धतः व्यवस्था है।

16.

विनिमय क्रिया जागृत मानव परंपरा में अनिवार्य प्रक्रिया है।

उत्पादन को दूसरी वस्तु व सेवा में बदलने के लिये अपनाई गई सुगम पद्धति ही विनिमय है, जिसकी सफलता के लिये प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक आवश्यकीय वस्तु का सहज सुलभ होने के लिये केन्द्रों का होना आवश्यक है। उत्पादन जितना महत्वपूर्ण है उतना ही उसके सहायक तत्व संरक्षण भी महत्वपूर्ण हैं। संरक्षण के अभाव में सशंकतावश, साधनों के अभाव में उत्पादन सामग्रियों की असंपूर्णतावश, शिक्षा के अभाव में अक्षमतावश, विनिमय के अभाव में दूसरी वस्तु व सेवा में परिवर्तित करने के विध्ववश उत्पादन में क्षति होती है। व्यवस्था का प्रत्यक्ष रूप में से उत्पादन एवं उसके सहायक तत्वों को सर्वसुलभ बनाना है। विधि का शुद्ध रूप ही सामाजिक मूल्यों यथा जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य व शिष्ट मूल्य का संरक्षण एवं संवर्धन है। ऐसी शुद्ध व्यवस्था के अंगभूत श्रम नियोजन एवं श्रम विनिमय पद्धति द्वारा सफल होने की पूर्ण संभावना है क्योंकि प्रत्येक मानव शोषण के विरुद्ध है। प्रत्येक मानव न्याय का याचक है। प्रत्येक मानव सही करना चाहता है। प्रत्येक मानव भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान से संपन्न होना चाहता है। साथ ही प्रत्येक वस्तु में निश्चित श्रम नियोजन होता है। प्रत्येक वस्तु का किसी एक वस्तु की अपेक्षा में श्रम मूल्य निर्धारण उपयोगिता मूल्य