मानव अभ्यास दर्शन

ईश्वर तंत्र पर आधारित राज्य नीति एवं धर्म नीति रहस्यता से मुक्त नहीं है।

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के आधार पर होता है। प्रत्येक वस्तु को प्रत्येक स्थान पर सर्वसुलभ बना देना सहज है।

17.

ईश्वर तंत्र पर आधारित राज्य नीति एवं धर्म नीति रहस्यता से मुक्त नहीं है।

मनुष्य रहस्यता में समाधान पूर्ण नहीं है। रहस्यता मानव की अनवरत पीड़ा है। पीड़ा मानव का अभीष्ट नहीं है। इसके आधार पर की गई स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य की व्याख्यायें यथावत रहस्यमय ही रही हैं। इसका निराकरण अर्थ तंत्र पर आधारित राज्य नीति एवं धर्म नीति है। साथ ही विकास के क्रम में पाये जाने वाले उत्थान एवं पतन के आधार पर ही स्वर्ग-नरक और पाप-पुण्य की व्याख्यायें रहस्य मुक्त होती हैं।

वैज्ञानिक युग प्रधानतः औद्योगीकरण तथा उसके योग्य व्यवस्था के लिए प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ है। फलतः मानव आर्थिक राज्य नीति का प्रयोग करने के लिये बाध्य हुआ है। आर्थिक राज्य नीति का लाभाकांक्षी एवं लाभोन्मूलन प्रभेद पद्धति से प्रयोग हुआ है। प्रकारान्तर से ये दोनों प्रयोग भय से मुक्त सिद्ध नहीं हुए हैं। यही तीसरे विकल्प को आवाहित कर रहे हैं। यह तीसरा विकल्प केवल धार्मिक, आर्थिक, राज्य नीति ही है।

संस्था समाज का ही प्रतिरूप है। संस्था की प्रक्रिया का जनाकांक्षा के विरोध में प्रस्तुत होना ही संघर्ष या क्रांति का कारण होता है। जनाकांक्षा सर्वदा ही न्याय की पक्षधर रही है। संस्था के प्रथम एवं द्वितीय स्थितियों में परिवार या वर्ग की सीमा में ही विधि व नीति की प्रतिस्थापना या स्थापना होती रही है। प्रत्येक संस्था की विचार रूप में भी मंगल कामना रही है। जब वह प्रक्रिया पद्धति, नीति व प्रणालीपूर्वक प्रस्तुत होती है तब जनाकांक्षा व संस्था की परस्परता में जो अव्यवहारिकताएं रह जाती है, वही अप्रत्याशित घटनाओं के रूप में प्रकट होती है। यही परस्पर विश्वास के तिरोभाव के कारण होते हैं। फलतः विरोध का प्रादुर्भाव एक आवश्यकता बनती है। इसके दो विकल्प प्रसिद्ध हैं:-

1.संस्था का मूल रूपात्मक दर्शन जिसके आधार पर निर्धारित विधि व व्यवस्था का सुदृढ़ न होना अर्थात् मानवीयता पर आधारित न होना।

2.संस्था की कार्य सीमा में पायी जाने वाली जनजाति में संस्कृति, सभ्यता का आधार मानवीयतापूर्ण न होना।

संस्कृति एवं सभ्यता के संरक्षणार्थ ही विधि एवं व्यवस्था की स्थापना है। सभ्यता