मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/67
संस्कृति में, से, के लिये ही सामाजिकता है। सामाजिकता के लिये ही उत्पादन, वितरण, उपयोग व सदुपयोग होना आवश्यक है। इसी कारणवश विधि व व्यवस्था का ध्रुवीकरण एवं उसकी अक्षुण्णता सर्व स्वीकार्य है। यह मानवीयता पूर्वक सफल और अमानवीयता में असफल सिद्ध हुआ है।
अर्थ संस्कृति में, संस्कृति सभ्यता में चरितार्थ होती है। अर्थ व्यवस्था से और सभ्यता विधि से सम्बद्ध है। यही सम्बद्धता उनकी अन्योन्याश्रयता को सिद्ध करती है। इसकी अक्षुण्णता मानवीयता में सफल और अमानवीयता में असफल सिद्ध हुई है। असफलता ही वर्ग संघर्ष, समर, पराभव, भय और आतंक है।
सामाजिकता औपचारिक तथ्य नहीं है अपितु जागृति पूर्वक जीने की शैली है। वह केवल वास्तविकता पर आधारित क्रियाकलाप है। वास्तविकताएं ही नियति क्रम, नियति क्रम ही विकास, विकास ही अभ्युदय, अभ्युदय ही व्यवहारिकता एवं व्यवहारिकता ही सामाजिकता है। व्यवहार संस्कृति, सभ्यता और विधि, व्यवस्था का योगफल है। मानव जीवन का आद्यान्त कार्यक्रम इसी चतुर्दिशा में वैभव है। विधि अनुभव को, संस्कृति विचार को, सभ्यता व्यवहार को, व्यवस्था उत्पादन विनिमय सहित पाँचों आयामों को स्पष्ट करती है। यह प्रमाण सिद्ध है। यही “मूल्य त्रय” को प्रकट करता है।
18.
प्रत्येक मानव इकाई भ्रम, भय, रहस्य मुक्ति के लिए प्रयासरत है।
संदिग्धता सशंकता एवं विरोध ही भय है। समाधान के विपरीत में विरोध है। मानव जीवन के कार्यक्रम को मानवीयता में स्पष्ट करने की क्षमता का अभाव ही संदिग्धता, रहस्यता, सशंकता एवं भय है।
मूलतः शुभाकाँक्षा रहते हुए भी कार्यक्रम में जो अपूर्णता रह जाती है वह आकाँक्षा के विपरीत फल का कारण बनती है यही अविश्वास स्थली है। अविश्वास पूर्वक सामाजिकता का निर्वाह नहीं है। यही भ्रम है।
भ्रमित विधि से संस्था की प्रथम व द्वितीय अवस्था में भय से मुक्ति पाना संभव नहीं है। इसी विवशतावश परिवार एवं वर्ग सीमावर्ती व्यवस्था संदिग्धता से मुक्त नहीं है। इसी संदिग्धतावश ही समर शक्ति का विस्तार हुआ है। समर संभावना पर्यन्त समाज एवं सामाजिकता की उपलब्धि नहीं है। समाज एवं सामाजिकता के बिना मानव आश्वस्त एवं विश्वस्त नहीं है।