मानव अभ्यास दर्शन

प्रत्येक मानव सामाजिकता के लिए समर्पित है।

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80/अभ्यास दर्शन

में दृष्टव्य है जो संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था का आद्यान्त कार्यक्रम है। कौतूहल तब तक भावी है जब तक मानव जीवन और सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व का पूर्ण विश्लेषण न हो जाए, साथ ही प्रकृति के विकास एवं जीवन जागृति में रहस्य न रह जाए। यह चारों अवस्था प्रकृति की स्थिति, स्थितिवता एवं उनके रूप, गुण, स्वभाव एवं धर्मवता के आधार पर अरहस्यमय सिद्ध हुई है और दश सोपनीय परिवार सभा व्यवस्था मानव की स्थितिवता के विश्लेषण से प्रत्येक मानव की जीवनी, जीवन का कार्यक्रम स्पष्ट हो चुका है।

22.

प्रत्येक मानव समाजिकता के लिए समर्पित होना चाहते है।

प्रत्येक मानव शुद्धतः संघर्ष, विषमता, द्रोह-विद्रोह को नहीं चाहता है। यह सब भ्रमित मानवकृत वातावरण के बाध्यतावश ही होता हुआ पाया जाता है। यही सामाजिकता के लिए अड़चन है। अखण्ड समाज व्यवस्था के बिना मानव में मानव चेतना प्रगट होना संभव नहीं है। मानव में विकास एवं जागृति के प्रति स्पष्ट ज्ञान, तदनुकूल आचरण, अनुसरण, संरक्षण, सहयोग व अध्ययन की न्यूनता ही सामाजिकता की अपूर्णता है। यह मानव के लिए वांछित एवं आवश्यक घटना नहीं है।

“निर्भ्रमता पूर्वक ही मानव चारों आयामों और दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था में पूर्णता का अनुभव करता है।” यह पूर्णता समाधान, समृद्धि, अभय एवं सहअस्तित्व के रूप में प्रत्यक्ष होती है। पूर्णता मानव जीवन एवं प्रकृति की विकास क्रम एवं जीवन जागृति की संहिता है। जिसका सार्थक भाषाकरण ही संहिता है। यह सर्ववांछित उपलब्धि हैं। मानव के संस्कारों के अन्तरान्तरवश उनमें अध्ययन, अन्वेषण, अनुसंधान एवं दर्शन क्षमता में विविधता पायी जाती है। सार्वभौम सिद्धांत, नीति एवं पद्धति को पाना अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा के लिए अनिवार्यतम आवश्यकता है जिसके बिना शिक्षा एवं व्यवस्था में सार्वभौमिकता संभव नहीं है। फलतः संस्कृति सभ्यता में सार्वभौमिकता संभव नहीं है। यही सभ्यता मानवीयता की अपेक्षा में अमानवीयता का, अतिमानवीयता की अपेक्षा में मानवीयता का, व्यापकता की अपेक्षा में अतिमानवीयता का, प्रकृति की अपेक्षा में व्यापकता का, क्रियाशीलता की अपेक्षा में प्रकृति का, ह्रास और विकास की अपेक्षा में क्रियाशीलता का, चार अवस्था की सृष्टि की अपेक्षा में ह्रास और विकास जागृति का विश्लेषण पूर्वक अध्ययन स्पष्ट है।

“मनुष्य निर्भ्रमता पूर्वक ही चारों आयामों तथा दश सोपानीय व्यवस्था में