मानव अभ्यास दर्शन

मानव में संचेतनशीलता ही संस्कार एवं जागृति सम्पन्नता ही आधार व प्रमाण है।

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86/अभ्यास दर्शन

जागृति की गरिमा, महिमा एवं सिद्धि है।

जागृति क्रम ही जागृतिशीलता पूर्वक प्रस्फुटित अवस्था एवं स्थिति है। यही समाधानित स्थिति है। मानव समस्या में, से, के लिए जीना नहीं चाहता है। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि अमानवीयता जागृति की श्रृंखला में मानव जीवन के कार्यक्रम के स्तर पर उपादेयी सिद्ध नहीं हुई है या स्वीकृत नहीं हुई है। यह आंकलन मानवीयता में संक्रमित होने के लिए भी प्रवृत्ति है। मानवीयता में ही जीवन एवं जीवन जागृति सहज कार्यक्रम विश्लेषित, व्यवहृत एवं चरितार्थ होता है। समर संभावना पर्यन्त मानव सामाजिकता का सत्यापक नहीं है। इसी लाजवश पुनः समर विहीन राज्य, प्रबुद्धतापूर्ण प्रभुता से संपन्न होने के लिए ही प्रयास है। यह प्रयास वर्ग विहीन, विविध जाति विहीन तथा युद्ध विहीन प्रस्ताव है जो प्रबुद्धता पूर्ण सम्प्रभुता सिद्धि अर्थात् पूर्णता से सम्पन्न जीवन संहिता को करतलगत एवं सामान्यीकरण करते रहेगा।

अखण्ड सामाजिकता का उदय होना ही अध्ययन में पूर्णता, व्यवस्था पद्धति में दृढ़ता, व्यक्ति में आचरण पूर्णत, समाज में अभयता है। यही सर्वमंगल कार्यक्रम एवं शुभ है।

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मानव में संचेतनशीलता ही संस्कार एवं जागृति सम्पन्नता सहज आधार एवं प्रमाण है।

यही व्यक्तित्व एवं प्रतिभा को प्रकट करती है। सतर्कता सहित सजगता ही प्रतिभा और सजगता ही व्यक्तित्व का प्रधान परिचय है, जिसके लिए निपुणता कुशलता एवं पाण्डित्य है। यही प्रतिभा के रूप में प्रमाण सिद्ध होता है। “तात्रय” (मानवीयता, देव मानवीयता, दिव्य मानवीयता) में किए जाने वाले आहार, विहार एवं व्यवहार के रूप में व्यक्तित्व प्रमाणित होता है। प्रतिभा में से निपुणता, कुशलता का परिचय उत्पादन में, व्यक्तित्व का परिचय व्यवहार में स्पष्ट होता है। तन, मन, धनात्मक अर्थ के सदुपयोग की सजगता उसके संरक्षण में सतर्कता है।

सतर्कता व सजगता प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संयुक्त रूप ही मानव जीवन है। यही प्रत्येक व्यक्ति में क्षमता, योग्यता और पात्रता के रूप में दृष्टव्य है जो वहन, प्रकटन एवं ग्रहण क्रिया है। प्रतिभा के नियोजन में उपयोगिता एवं कला सिद्ध होती है। यही सतर्कता है। यही नियोजन में उपयोगिता एवं कला सिद्ध होती है। यही सतर्कता है। यही व्यवहार विषमता का उन्मूलन करती है। फलतः अभयता सिद्ध होती है। अनुभव मूलक आचरण में ही सजगता सिद्ध होती है, जो अर्थ के सदुपयोग के रूप में स्पष्ट होती है। यही सहअस्तित्व को सिद्ध करती है।