मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/89
“संचेतनशीलता का पूर्ण उपयोग समाज में व्यवहार और व्यक्ति में अनुभूति है।” अनुभव विहीन आचरण पूर्ण नहीं है। मूल्य ही सत्य है। सत्य ही अनुभूति है। सामाजिक मूल्यानुभूति ही अखण्डता का और वस्तु मूल्यानुभूति ही समृद्धि का द्योतक है। वस्तु मूल्यानुभूति के बिना उसका उत्पादन संभव नहीं है। धर्मीयता का अनुभव हो जाना ही मूल्यानुभूति है। वस्तु मूल्यानुभूति ही उत्पादन, समृद्धि में सफलता है। यही आवश्यकता से अधिक उत्पादन की क्षमता है। मूल्यानुभूति में असमर्थता ही उत्पादन में अपूर्णता, सदुपयोग में अक्षमता एवं सुरक्षा में असमर्थता है। परिणामतः दरिद्रता एवं असामाजिकता है। व्यवहार मूल्य के अनुभव में जो अक्षमता है वही संदिग्धता, सशंकता, अविश्वास एवं भय है। फलतः मानव में आतंक, युद्ध एवं असहअस्तित्व है। इससे स्पष्ट होता है कि असामाजिकता के मूल में व्यवहार एवं व्यवसाय मूल्य का अनुभव करने की अक्षमता है। यही आंकलन मानव को मूल्यानुभूति के लिये प्रवर्तित करता है। मूल्यानुभूति ही सामाजिक अखण्डता है, जिसमें संस्कृति सभ्यता एवं विधि व्यवस्था की एकरूपता पायी जाती है। यही मानवीयता का साकार रूप है, जो मानव के लिए चिर प्रतीक्षित तथ्य है। यही सर्वमंगल, शुभ एवं वाँछित घटना है।
27.
सामाजिकता का आधार संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था ही है।
उपलब्धि सहअस्तित्व एवं समृद्धि है। पूर्णता को प्रमाणित करने की प्रक्रिया श्रृंखला ही संस्कृति है, जिसका आचरण ही सभ्यता है। मानव जीवन में पूर्णता का प्रमाण केवल सहअस्तित्व ही है, जिसकी व्यवहारिक सुगमता के लिए समृद्धि की आवश्यकता होती है जो महत्वाकांक्षा एवं सामान्य आकांक्षा के अंतर्गत सीमित हैं। संस्कृति के मूल रूप विचार ही है। ये विचार “तात्रय” मानवीयता, देवमानवीयता व दिव्य मानवीयता के अर्थ में है। अमानवीय परंपरा सामाजिक नहीं है। असामाजिक आहार, विहार, व्यवहार, जाति, धर्म, भाषा, उत्पादन, उपभोग, वितरण ये सब सहअस्तित्व को सिद्ध करने में समर्थ सिद्ध नहीं हुए हैं। सहअस्तित्व के बिना अखण्ड समाज एवं सामाजिकता नहीं है। उत्पादन परंपरा भी सामाजिकता के लिए है। सामाजिकता का विरोध, विद्रोह एवं आतंक में प्रयुक्त उत्पादन सहअस्तित्व के लिये निषेध है। इसी आंकलन वश इस सीमा में प्रयुक्त सभी शक्तियाँ अनुपयोगी, दुरुपयोगी और निरर्थक सिद्ध हुई साथ ही समाज एवं सामाजिकता के विकास अर्थात् पूर्णता के क्रम में बाधक सिद्ध हुई है। सामाजिकता के बिना मानव परंपरा में सफल अर्थ व्यवस्था नहीं है। सहअस्तित्व में