मानव अभ्यास दर्शन

जिज्ञासात्मकता सुखी होने के अर्थ में एवं आवेशात्मक क्रियाकलाप के फलस्वरूप पीड़ाएं प्रसिद्ध हैं।

Page 92

92/अभ्यास दर्शन

अवस्था में पायी जाने वाली शिक्षा ही है। इस शिक्षा एवं शिक्षण समुच्चय को मानवीयता से परिपूर्ण किया जाना ही अखण्डता की स्थापना है। यही क्रम अखण्ड सामाजिकता की अक्षुण्णता है। यही सर्वमंगल, शुभ, धर्म की सफलता है।

“मानव में अखण्ड समाज परंपरा ‘तात्रय’ में ही अभिव्यक्त होता है।” जागृत मानव सहज अभिव्यक्ति के लिए इससे अधिक कोई वस्तु नहीं है। समाज के लिए सहायक तत्व ही विधि, असहायक तत्व ही निषेध है, जो मानवीयता एवं अमानवीयता की सीमा में स्पष्ट हो चुकी है। प्रत्येक परंपरा भी पूर्णता को पाना चाहती है। किंवा प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण होना चाहता है। पूर्णता के लिए ही गुणात्मक परिवर्तन की संभावना, पद्धति एवं प्रक्रिया पूर्वक स्थिति है। यही संभावना वर्गीय और सामुदायिक मान्यता से मुक्त होने की भी है। उत्कंठा अथवा पीड़ा की पराकाष्ठा के अनन्तर ही प्रत्येक इकाई परिवर्तन में समर्पित हुई है। उत्कंठा ही जिज्ञासा है, पीड़ा अभाव का द्योतक है। जिज्ञासा मूलक पीड़ा अथवा पीड़ा मूलक जिज्ञासा प्रसिद्ध है। इन दोनों का योगफल ही अग्रिमता में संक्रमण है। मानव में पीड़ा प्रतिक्रिया मूलक होना स्वाभाविक है।

28.

जिज्ञासात्मकता सुखी होने के अर्थ में एवं आवेशात्मक क्रियाकलाप के फलस्वरूप पीड़ाएं प्रसिद्ध हैं।

अज्ञात और अप्राप्त के प्रति जिज्ञासायें हैं। जिज्ञासात्मक आवश्यकता ही अनुसंधान की उत्प्रेरणा है। आवेशात्मक पीड़ा सम्मोहन व विरोध के रूप में है जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य मूलक है। काम, मद, मोह, लोभ सम्मोहनात्मक; क्रोध व मात्सर्य विरोधात्मक हैं। औचित्यता के संदर्भ में अनौचित्यता के प्रति प्रतिकारात्मक आवेश का होना पाया जाता हैं औचित्यता एवं अनौचित्यता मानवीयता पूर्वक नियम त्रय के रूप में निर्धारित हुई हैं।

औचित्यता के प्रति स्वीकृति

विकास, गुणात्मक परिवर्तन, परिवर्तन के लिए जिज्ञासा की संभावना

औचित्यता की अस्वीकृति में पीड़ा (समाधान की जिज्ञासा)

ह्रास, ऋणात्मक, गुणात्मक परिवर्तन की संभावना

अनौचित्यता की अस्वीकृति ही औचित्यता की अपेक्षा

विकास, गुणात्मक परिवर्तन की संभावना