मानव अभ्यास दर्शन

मानव में न्यायापेक्षा, सही करने की इच्छा और सत्यवक्ता होना जन्म से ही दृष्टव्य है।

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मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/93

अनौचित्यता की स्वीकृति पीड़ा

- ह्रास, ऋणात्मक परिवर्तन की संभावना और अपराध प्रवृत्ति

गुणात्मक परिवर्तन ही धनात्मक परिवर्तन है। जागृति ही धनात्मक परिवर्तन है। जागृति पूर्णता में, से, के लिए ही है। प्रत्येक मानव पूर्णता से सम्पन्न होना चाहता है। मानव में, से, के लिए पूर्णता केवल क्रिया पूर्णता एवं आचरण पूर्णता ही है। अनुचित अर्थात् अमानवीयतावादी पद्धति व प्रक्रिया से पूर्णता सिद्ध नहीं हुई है। प्रत्येक मानव जन्म से वर्ग विहीन है, समुदाय विहीन है, सम्प्रदाय विहीन है, साथ ही उसमें सफलता एवं पूर्णता से सम्पन्न होने की पीड़ा समाहित रहती है। पीड़ा के बिना संक्रमण व्यतिक्रमण (ह्रास) सिद्ध नहीं हुआ है। सम्यकता की ओर प्रवेश ही संक्रमण है। लक्ष्य के विपरीत दिशा में गति ही व्यतिक्रमण है। कोई मानव अनौचित्य और व्यतिक्रमण के पक्ष में नहीं है। प्रत्येक मानव आचरण, क्रिया एवं व्यवहार में सफलता तथा समाधान पूर्ण पद्धति से उत्पादन, उपभोग, वितरण प्रक्रिया सम्पादित करना चाहता है। जिसके लिए ही प्रत्येक मानव शिक्षा एवं व्यवस्था में समर्पित होता है। शिक्षा एवं व्यवस्था से समाधान का न मिलना ही अविश्वास अवाँछनीय बाध्यताएं हैं। फलतः संघर्ष एवं युद्ध है।

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मानव में न्यायापेक्षा, सही करने की इच्छा और सत्य वक्ता होना जन्म से ही दृष्टव्य हैं।

जन्म के अनन्तर वर्ग, जाति, मत, सम्प्रदाय का आरोपण होता है। शुद्धतः प्रत्येक संतान केवल मानव संतान है। इसमें मानव से अतिरिक्त जाति, मत, संप्रदाय, वर्ग, बोध को उनके माता-पिता परिवार तथा प्रतिबद्ध समूह प्रस्थापित करते हैं जो एक पारम्परिक प्रक्रिया है। वह वर्ग सीमा से अधिक नहीं हैं। शैशवावस्था से ही तदाकार वृत्ति होती है। फलतः विभिन्न जाति, मत, सम्प्रदाय, धर्म, वर्ग को मानता है। फलतः उसी सीमा में स्व-अस्तित्व को मानता है। यह मान्यता उसको उस वर्ग के सीमावर्ती कार्यकलाप, आचरण, व्यवहार में प्रवृत्त होने के लिए बाध्य करता है। यह बाध्यताएं तब तक रहेगी जब तक किसी विशेष घटनावश उसमें विशिष्ट परिवर्तन न हो जाये। विशिष्टता का तात्पर्य मानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्ण जीवन में स्थिति को पा लेने से है। ऐसा व्यक्ति जिस परंपरा से उद्गमित हुआ रहता है उसी परंपरा में उसकी विशिष्टता एवं शिष्टता का समावेश करने के लिए प्रयास करता है। पहले से ही वह परंपरा किसी सीमा से सीमित रहने के कारण अनुभवमूलक तत्वों का समावेश करने में