मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/99
रहेगी अन्यथा में, से, के लिए उससे वंचित होने अवश्यम्भावी है। यह सत्यता मानव को उत्प्रेरित करती है कि उपलब्धि एवं उपलब्धि के स्रोत अस्त होने के पहले उसे अनुस्यूत बनाये रखने के लिए तत्पर हो जाए। यह तत्परता केवल देव पद चक्र में ही सफल होती है। इसी में समाधान समृद्धि पूर्वक सत्यता की अनुभूति प्रमाणित होती है। अनुभूति मूलक जीवन ही मानव का चिरवांछित जीवन है। भ्रांति पर्यंत अनुभव संभव नहीं है। अनुभव ही जीवन का वरीयतम आयाम है जिस में, से, के लिए अन्य तीनों आयाम अर्थात् विचार, व्यवहार एवं उत्पादन अनुभव से ही संचालित होना अभ्युदय है। अस्तु, मानव जीवन के कार्यक्रम को मानवीयता पूर्वक दश सोपानीय व्यवस्था में आत्मसात् कर लेना ही सर्वमंगल, शुभ, समाधान, समृद्धि, सहअस्तित्व एवं अभय है।
31.
मानवीयतापूर्ण जीवन में, से, के लिए सुसंस्कारों का अभाव नहीं है।
गर्भ संस्कार से ही मानव में संस्कार प्रक्रिया आरंभ होती है। गर्भावस्था में गर्भवती द्वारा किया गया धीरता, वीरता और उदारतापूर्ण एवं दया, कृपा, करूणा पूर्ण संभाषण एवं आचरण गर्भस्थ शिशु में उत्तम संस्कारों का कारण होता है। गर्भवती द्वारा किये गए व्यक्तित्व के स्मरण एवं आचरण गर्भस्थ शिशु में सुसंस्कारों के कारण होते हैं। गर्भवती में पायी जाने वाली सौम्यता, सरलता, पूज्यता, सौजन्यता, अनन्यता, सहजता, उदारता, सौहार्द्रता एवं निष्ठा पूर्ण आचरण गर्भगत शिशु में सुसंस्कारों का कारण होता है। गर्भवती द्वारा कृतज्ञता, श्रद्धा, गौरव, प्रेम, वात्सल्य, विश्वास, स्नेह, ममता एवं सम्मान की अनुभूतियाँ गर्भगत शिशु में सर्वोच्च संस्कारों का निर्माण करती है। गर्भ से संस्कारपूत शिशु में जन्म और जन्म के अनंतर सुसंस्कारों को ग्रहण करने में सुगमता होता है। गर्भवती के आहार, विहार, व्यवहार की संयमता गर्भगत शिशु में वरिष्ठ संस्कारों को प्रदान करती है। गर्भावस्था में शिशु में प्राण व रस का संचालन एवं पूर्ति गर्भवती के शरीर के क्रियाकलाप पर आधारित है। यही गर्भस्थ शिशु का वातावरण है। वातावरण का दबाव स्वाभाविक है। वातावरणस्थ क्रिया का संकेत प्रसारण प्रदायिता सहित प्रक्रिया ही वातावरण का दबाव है। चैतन्य क्रिया में वातावरणस्थ क्रियाओं के संकेत ग्रहण एवं प्रसारण प्रक्रिया को पाया जाता है। गर्भस्थ शिशु के शरीर के साथ चैतन्य क्रिया का होना स्वाभाविक है। अस्तु, गर्भस्थ शिशु का वातावरण शुभद होने के लिए जो निश्चित पद्धति वर्णित है उसके विपरीत अर्थात् अमानवीयता पूर्ण जीवन यापन पूर्वक सुसंस्कारपूत संतान को पाना संभव नहीं है।