मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/109
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संस्कार ही संस्कृति को प्रकट करता है।
संस्कृति ही सभ्यता को अभिव्यक्त करती है। आहार, विहार एवं व्यवहार के रूप में सभ्यता स्पष्ट होती है। इनके वरीयता क्रम में व्यवहार, विहार एवं आहार है। व्यवहार में एकात्मकता की प्रतीक्षा है यही न्याय की याचना अथवा प्रत्याशा है। परस्पर व्यवहार में ही न्यायग्राही-प्रदायी बाँछा सफल होती है। इसकी विफलता ही परस्पर विरोध-विद्रोह है। द्रोह का ही विद्रोह होता है। अज्ञान, अत्याशा एवं अभाव ही मानव के अपराध का मूल कारण है। अभाव को भाव में, अत्याशा को सामान्य आकांक्षा एवं महत्वाकांक्षा में परिवर्तित कर देना ही सामाजिक व्यवस्था है। व्यवस्था का विरोध नहीं है। अव्यवस्था ही द्रोह है। व्यवस्था मानव जीवन का एक भाग है। व्यवहार व्यवस्था को, विहार अर्थात् आचरण संस्कृति को एवं आहार स्वास्थ्य को प्रकट करता है। व्यवहार में अनन्यता का प्रस्फुटित होना ही न्यायपूर्ण व्यवहार की चरितार्थता है। अनन्यता में अन्याय का होना संभव नहीं है। अन्यत्व में ही अपराध का होना पाया जाता है। अनन्यता ही जीवन में चरितार्थता है। यही अखण्ड सामाजिकता को सिद्ध करती है। अन्यता सामाजिकता या समाज का निर्माण करने में समर्थ नहीं है। अन्यता व्यक्ति, परिवार एवं वर्गीयता से मुक्त नहीं है। ये संघर्ष एवं युद्ध से मुक्त नहीं है। मानव में अनन्यता की प्रचुरता जन्म से ही पायी जाती है क्योंकि प्रत्येक मानव उनके नाम से अनन्यता, तादात्म्य एवं तद्रूपता को पाता है। इसी क्रम से माता, पिता, परिवार, बंधु-बांधव, समाज, राष्ट्र एवं अन्तर्राष्ट्र में अनन्यता को स्थापित करने की संभावना है क्योंकि स्थापित मूल्य सर्वत्र समान है। संबंध विहीन मानव नहीं है। एक मानव संपूर्ण मानव से सम्बद्ध है ही। शिष्ट मूल्य और वस्तु मूल्य भी सर्वत्र समान है। यह सर्वदेशीय, सर्वकालीय मूल्यवत्ता ही अनन्यता का आधार है। स्थापित मूल्य ही मानव जीवन का आधार है क्योंकि मानव जीवन की प्रमाणिकता अनुभव में, से, के लिए है। अनुभव केवल मूल्य में, से, के लिए है। स्थापित मूल्य ही अनुभव, शिष्ट मूल्य ही आचरण एवं व्यवहार, वस्तु मूल्य ही समृद्धि है। यह सर्वत्र समान है। यही सत्यता अनन्यता की संभावना को स्पष्ट करती है।
विहार ही आचरण के रूप में प्रत्यक्ष है। श्रम हरणार्थ की गई प्रक्रिया विहार है। आशा-आकांक्षा एवं आवश्यकता या अनिवार्यता पूर्वक की गई चरितार्थता ही आचरण है जो इतिहास के अर्थ में चरितार्थ है। ऐतिहासिक अर्थवत्ता नियति क्रमानुषंगिक निष्पन्न होती है। प्रकृति का विकास क्रम ही नियति क्रम है। प्रत्येक मानव की रूचियाँ आचरण में अभिव्यक्त होती है। रूचियाँ संवेगानुरूपीय, संवेग मूल प्रवृत्ति के रूप में, मूल प्रवृत्तियाँ संस्कार मूलक प्रक्रिया के रूप में दृष्टव्य है। संस्कारानुबंध आचरण विशेषतः स्वयं की तृप्ति के लिए