मानव अभ्यास दर्शन

केवल उत्पादन ही मानव के लिए जीवन सर्वस्व नहीं है।

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110/अभ्यास दर्शन

प्रायोजित होता है जबकि व्यवहार प्रधानतः परतृप्ति के संदर्भ में भी सम्पन्न होता है। स्वयं में तृप्ति मानवीयता पूर्ण पद्धति से “नियम त्रय” के पालन में सर्वसुलभ होती है। अमानवीयता में वह सुलभ नहीं है। अमानवीय मूल प्रवृत्तियाँ भय से मुक्त नहीं है। भय स्वयं में तृप्ति का साधन नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मानवीयता पूर्ण पद्धति से किया गया विचार ही विश्राम के लिए एकमात्र शरण है। मानवीयता सहज आचरण पूर्वक भय का अभाव होता है। समाधान एवं समृद्धि का भाव होना पाया जाता है।

आहार शरीर पोषण के लिए चरितार्थ होता है। शरीर विहार, व्यवहार एवं उत्पादन के अर्थ में सार्थक साधन है। अमानवीयता में आहार ही महत्वपूर्ण आकांक्षा के रूप में ज्ञातव्य है। मानवीयता में व्यवहार एवं अतिमानवीयता में आचरण ही सर्वोच्च महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। आहार, विहार एवं व्यवहार की एकात्मकता ही जीवन में तृप्ति है। इनमें अन्तर्विरोध ही अतृप्ति है। अतृप्ति शिक्षा का विषय नहीं है। तृप्ति ही शिक्षा के लिए विषय वस्तु है। प्रत्येक मानव किसी न किसी अंश में शिक्षक एवं शिक्षार्थी है जो प्रत्यक्ष है। इस पद्धति से यह निष्कर्ष मिलता है कि मानवीयता पूर्ण आचरण एवं व्यवहार निर्वाह करने योग्य अथवा सहायक रूप में ही आहार का सेवन सर्वोच्चित होगा।

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केवल उत्पादन ही मानव के लिए जीवन सर्वस्व नहीं है।

वस्तु मूल्य के आधार पर समाज संरचना संभव नहीं है। उत्पादन मानव जीवन का एक आयाम है। आचरण को प्रस्तुत करने हेतु पायी जाने वाली सीमा ही आयाम है। मानव के आयाम चतुष्टय सम्पन्न होने के कारण, इन्हीं के आधार पर स्वस्थ्य समाज की संरचना होती है। उत्पादन से समृद्धि का होना पाया जाता है। अन्य आयामों के अभाव में वह निर्मूल्य हो जाता है। व्यवहार ही वस्तु मूल्य को समुचित पद्धति से संयत करता है अर्थात् व्यवहार में ही वस्तु मूल्य की प्रयुक्ति हैं, जिसकी सदुपयोगिता मानवीयता पूर्ण व्यवहारिका में सिद्ध होती है। अमानवीयता की सीमा में सम्पूर्ण समृद्धि पूर्वक उभय आकांक्षा से संबंधित सभी वस्तुओं के उपलब्ध रहते हुए मानव की परस्परता में विश्वास के अभाव में वे सभी साधन समाधान के लिए प्रयुक्त होने में असमर्थ पाये जाने जाते हैं। मानव जीवन में चतुष्टय आयाम वरीयता क्रम से अनुभव, विचार, व्यवहार एवं उत्पादन है। वैचारिक समाधान के बिना उत्पादन-विनिमय उपलब्धियाँ, अनुभूति के बिना अर्थात् सत्य में अनुभूति व मूल्यानुभूति के बिना व्यवहार में अभयता नहीं पायी जाती। व्यवहार में अभयता ही वैचारिक (बौद्धिक) समाधान