मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/121
के संतुलित उदय से है। यह उदय शिक्षा एवं व्यवस्था से संपन्न होता है।
36.
समाधान, समृद्धि, अभय एवं सहअस्तित्व में अनुभव मानव धर्म की चरितार्थता है।
ये चारों मानव धर्म परंपरा के अविभाज्य तथ्य हैं। विचार शक्ति का प्रसारण ही चैतन्य क्रिया की स्वाभाविक प्रक्रिया है। विवेचना के अर्थ में विचार चरितार्थ होता है। किसी के भी प्रति पूर्ण विवेचना हो जाना ही समाधान है। विवेचना उसी की होती है जिसमें एक से अधिक तत्व, गुण एवं स्वभाव सम्मिलित हों या अपेक्षाकृत हों। विश्लेषण सत्ता में संपृक्त प्रकृति की स्थिति से संबद्ध है। सत्ता गति एवं तरंग विहीन होने के कारण, अमूर्त होने के कारण अथवा प्रकृति का आधार होने के कारण इसका विश्लेषण व्यापक पारगामी, पारदर्शी ही है। इसमें ज्ञान और अनुभूति ही प्रमाणित होता है। मानव चैतन्य प्रकृति ही जागृति पूर्वक सत्ता में अनुभूत प्रमाण को प्राप्त करता है। चैतन्य प्रकृति के मानव में अनुभव संभावना सन्निहित है। यह क्रम से जीवावस्था से भ्रांत पशु मानव एवं राक्षस मानव में, भ्रांताभ्रांत मानव में, निर्भ्रांत देव मानव एवं दिव्य मानव में प्रमाण रूप में दृष्टव्य है। मानव ने ही इन पाँचों स्थितियों में जागृति क्रम जागृति सहज व्यवस्थात्मक सत्यता को अभिव्यक्त किया है। मानव परंपरा का स्वधर्मीयता के अतिरिक्त ऐतिहासिक होना संभव नहीं है। इतिहास ही अक्षुण्णता का साक्षी है और उसके आनुषंगिक कार्यक्रम ही विश्वास है। जागृति सहज इतिहास संबद्ध कार्यक्रम के बिना चरितार्थता एवं योजना के प्रति अथवा कार्यक्रम के प्रति विश्वास स्थापना संभव नहीं है। विश्वास के अभाव में निष्ठा का होना नहीं पाया जाता है। निष्ठा होने के लिए विश्वास का होना अनिवार्य है। विश्वास ही साम्य मूल्य है। विश्वास विहीन धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनैतिक कार्यक्रम सफल नहीं होता। असफलता इतिहास नहीं है। वह एक अवांछित व अस्वीकृत घटना है। सफलता की परंपरा होती है। असफलता की परंपरा नहीं होती है। सफलता के क्रम में ही गुणात्मक परिवर्तन संभव है। असफलता का कोई क्रम नहीं होता, अपितु व्यतिक्रम होता है। व्यतिक्रम ही भ्रम है। इस तथ्य से सिद्ध हो जाता है कि असफलता गुणात्मक परिवर्तन नहीं है। इसके स्थान पर वह प्रतिक्रान्ति है। ह्रास अपेक्षाकृत व्यतिक्रम ही है। क्रम एवं व्यतिक्रम दोनों ही नियम से संरक्षित हैं।
मानव में ही समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व में अनुभव प्रमाण पर अधिकार, व्यवहार में संयमता, विचार में स्वतंत्रता एवं अनुभव “पूर्ण” स्वत्व है। यही मानव धर्मीयता के प्रसारण का प्रत्यक्ष साक्ष्य है। मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकात्मता