मानव अभ्यास दर्शन

व्यक्ति का व्यक्तित्व न्याय प्रदायी क्षमता से प्रदर्शित है।

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122/अभ्यास दर्शन

एवं मानव की पाँचों स्थितियों की एकरूपता में ही मानव धर्म की अक्षुण्णता होती है।

37.

व्यक्ति का व्यक्तित्व न्याय प्रदायी क्षमता से प्रदर्शित है।

प्रत्येक व्यक्ति मानवीय धर्म को प्रसारित एवं प्रमाणित करने के लिए इच्छुक है। धर्मीयता विहीन इकाई नहीं है। हर जागृत मानव का आचरण ही मानव परंपरा में आचरण के लिए शिक्षा है। प्रत्येक मानव का आचरण दूसरे के ज्ञातव्य में आता है। प्रत्येक मानव वातावरणस्थ क्रियाओं के संकेत को किसी न किसी अंश में ग्रहण करने योग्य क्षमता से सम्पन्न है। शिक्षा परंपरा ही प्रधानतः संस्कृति का प्रथम सोपान है। यही न्यायपूर्ण व्यवहार, संयत आचरण एवं नियम पूर्ण उत्पादन के लिए समुचित प्रोत्साहन, प्रेरणा, मार्गदर्शन, सहयोग एवं सहानुभूति पूर्ण कार्यक्रम को वहन पूर्वक अर्थात् निर्वाह पूर्वक स्पष्ट करती है। यही संस्कृति पूर्ण सभ्यता का अर्थ है। इसी से धीरता, वीरता एवं उदारता पूर्ण व्यवहार का प्रसव होता है। यही सामाजिक अभयता एवं अखण्डता का द्योतक है। यही सभ्यता है। सभ्यता के संरक्षण के लिए ही विधि व व्यवस्था का प्रभावशीलन है। यही ऐतिहासिक परंपरा सहज सूत्र है। यही जागृत जीवन परंपरा है। ऐसी ऐतिहासिक जीवन परंपरा में अपूर्णता की पूर्णता भावी है। यही ऐतिहासिकता की गरिमा है।

सफलता क्रम अथवा परंपरा ही पूर्णता को प्रदान करती है। “पूर्णता त्रय” स्पष्ट है ही। मानव में पूर्णता का प्रत्यक्ष रूप ही अखण्डता, सार्वभौमता, अभयता एवं समृद्धि है। यही जीवन तृप्ति एवं तृप्ति योग्य कार्यक्रम के लिए प्रेरणा स्रोत है। सामाजिक अखण्डता में ही अभयता सर्वसुलभ होती है। जीवन में तृप्ति ही स्वधर्मीयता पूर्ण प्रसारण का प्रधान लक्षण है। मानव संस्कृति ही सामाजिक अखण्डता, अभयता एवं समृद्धि को सिद्ध करती है।

“पाण्डित्य ही जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य की अनुभूति एवं शिष्ट मूल्य की अभिव्यक्ति है।” प्रत्येक जागृत मानव जीवन सफलता सहज कामना से ओत-प्रोत है। प्रधानतया सफलता अनुभूति एवं शिष्टता ही है। यह अनुभव एवं व्यवहार सिद्ध प्रमाण है। अनुभूति विहीनता पूर्वक शिष्टता सहित जीवन सफलता का प्रमाण नहीं है। अनुभवशील या अनुभव पूर्ण हो, शिष्ट न हो इसका भी प्रमाण नहीं है। शिष्ट न होने में अनुभव का न होना ही है। साथ ही अनुभव का न होना ही शिष्ट न होना है। इसका निराकरण मानव धर्म से परिपूर्ण होना ही है जो अनुभव पूर्वक है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। मानव धर्म के अतिरिक्त सामाजिक अखण्डता का प्रमाण नहीं है। इसे स्थापित एवं संरक्षित करना ही शिक्षा