मानव अभ्यास दर्शन

संपूर्ण अध्ययन अनुभूति, समाधान, सहअस्तित्व एवं समृद्धि के लिए ही है।

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मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/125

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संपूर्ण अध्ययन अनुभूति, समाधान, सहअस्तित्व एवं समृद्धि के लिए ही है।

अनुभूति एवं समाधान विहीन अध्ययन, पठन-पाठन प्रकाशन, प्रदर्शन, कार्य, व्यवहार एवं आचरण मानवीयता को अभिव्यक्त करने तथा उसका संरक्षण करने में असमर्थ है। ये सब समस्याओं का निर्माण करने के लिए प्रक्रियायें हैं। समस्या का प्रचार समाधान नहीं है। हीनता-दीनता एवं क्रूरता का प्रचार समाधान नहीं है। नीचता, निष्ठुरता एवं शठता का प्रचार समाधान नहीं है। जो समाधान नहीं है वह इतिहास नहीं है। जो इतिहास नहीं है वह गौरव नहीं है। जो गौरव नहीं है वह जीवन का आधार नहीं है उससे कार्यक्रम सिद्धि नहीं है। जो कार्यक्रम सिद्धि नहीं है वह जीवन में गुणात्मक परिवर्तन का सहायक नहीं है। फलतः दिशा हीनता, भ्रम-भटकाव, अनिश्चयता-मोह, आलस्य-प्रमाद, निष्ठुरता-हठ, रोष-आक्रोश, अकर्मण्यता-अशिष्टता, भय-सशंकता एवं संदिग्धता पूर्वक तन-मन-धनात्मक अर्थ का अपव्यय होता हुआ देखा जाता है। अनुभव एवं समाधान का न होना ही व्यवहारिक एवं उत्पादक न होना है। फलतः सहअस्तित्व एवं समृद्धि का भी न होना है। समाधान समृद्धि, अनुभव एवं व्यवहार के अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा पर आधारित है। अनुभव एवं समाधान पूर्ण होना ही शिक्षा एवं व्यवस्था संहिता है। इन आधारों का अनुभव एवं समाधान ही शिक्षा व व्यवस्था का आद्यान्त लक्ष्य एवं कार्यक्रम के लिए आधार है। ये जब तक परिपूर्ण नहीं होते तब तक इनका सर्वसुलभ होना संभव नहीं है। समाधान एवं अनुभूति की सर्वसुलभता से ही सामाजिकता एवं उसकी अक्षुण्णता सिद्ध होती है। इसके लिए संपूर्ण शिक्षा एवं व्यवस्था संहिता को मानवीयता में परिवर्तित कर लेना ही एकमात्र उपाय है। जब तक व्यवहारिक संरक्षण नहीं, साथ ही शिक्षा भी सर्वसुलभ नहीं होती तब तक व्यक्तित्व एवं प्रतिभा के संतुलन, संस्कृति एवं सभ्यता के संतुलन, विधि एवं व्यवस्था के संतुलन की अपेक्षा एक दुरुहता ही है। “दुरुहता ही रहस्य है।” रहस्य एक अनिश्चयता, सशंकता या भ्रम है। दुरुहता की स्थिति मानव के लिए गति एवं दिशा निर्देशन पूर्वक गुणात्मक परिवर्तन के लिए उपकारी सिद्ध नहीं हुई है। जबकि मानव जीवन में गुणात्मक परिवर्तन हेतु निश्चित दिशा एवं गति को प्रदान करना ही शिक्षा नीति-पद्धति-प्रणाली का एकमात्र उद्देश्य है, जिसमें ही उत्पादन क्षमता का निर्माण करने वाले समर्थ तत्वों का समाया रहना आवश्यक है। समर्थ शिक्षा ही गन्तव्य के लिए गति एवं विश्राम के लिए दिशा को अध्ययन पूर्वक स्पष्ट करती है। यही शिक्षा की गरिमा है। उसी से मानव में प्रगति एवं जागृति है। यही अभ्युदय का प्रधान लक्षण है। शिक्षा एवं व्यवस्था का संकल्प ही अभ्युदय है। अभ्युदय विहीन जीवन ही समस्या से ग्रस्त होना पाया जाता है। जीवन के कार्यक्रम का