मानव अभ्यास दर्शन

समाज संरचना का आधार “मूल्य त्रय” ही है।

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134/अभ्यास दर्शन

योग्य क्षमता निर्माण करने के लिए शिक्षा अर्थात मूल्यग्राही एवं प्रदायी कार्य में पारंगतता से है। इसका प्रत्यक्ष रूप स्थापित मूल्यों की शिष्ट मूल्य सहित एवं वस्तु मूल्य समेत अभिव्यक्ति है। वस्तु उत्पादन का विपुलीकरण करने के लिए साधन एवं प्रतिभा का समुचित संयोजन किया जाना भी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण कार्य है। प्रत्येक उत्पादित भौतिक वस्तुओं की आवश्यकीय वस्तु एवं सेवा में परिणत करने के लिए सहज सुलभ विनिमय व्यवस्था की स्थापना भी सामाजिक व्यवस्था का एक प्रमुख भाग है। शिष्ट मूल्य एवं व्यवसाय मूल्य का संरक्षण एवं संवर्धन कार्यकलाप ही विधि व व्यवस्था की चरितार्थता है।

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समाज संरचना का आधार “मूल्य त्रय” ही है।

“मूल्य त्रय” की एकसूत्रता अखण्ड सामाजिकता के लिए अनिवार्य है। व्यवहार एवं उत्पादन के मध्य में रिक्तता नहीं है। इन दोनों की संयुक्त स्थिति मानव जीवन में दृष्टव्य है। व्यवहार, उत्पादन के लिए प्रेरणा है। व्यवसाय उत्पादन के लिए साधन है। व्यवहार एवं उत्पादन में आश्वस्त एवं विश्वस्त होना तथा उसकी अक्षुण्णता या परंपरा का सुदृढ़ होना ही समाज एवं सामाजिकता की उपलब्धि है। व्यवहार एवं उत्पादन की सफलता क्रम से अनुभूति एवं समाधान का प्रकटन है। मानव में प्रत्येक असफलता को सफलता में परिणत करने की कामना पायी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए सामाजिक संरचना में भागीदारी करने का अवसर समान है। उसके योग्य क्षमता में वैविध्यता ही शिक्षा एवं व्यवस्था से परिमार्जित एवं नियंत्रित होने के लिए प्रस्तुत होता है। समाज संरचना का प्रत्यक्ष रूप व्यवहार एवं उत्पादन ही है। उत्पादन विनिमय अभीप्सा, व्यवहारिक अभीष्ट मानव मात्र में समान है। अवसर एवं साधन की विषमता ही उनमें वैविध्यता है। उनमें जो वैविध्यता है, वही प्रकटन में वैविध्यता है। यही परस्परता में वैविध्यता है। मानव में मूलतः अभीप्सा एवं अभीष्ट साम्य होने के कारण समाज संरचना के आधार में स्थिरता पायी जाती है। यही सत्यता आशा, आकांक्षा एवं संकल्प को उद्गमित कराती है, जिससे समुचित एवं संतुलित समाज संरचना सिद्ध हो सके। यही चिंतन परंपरा का आधार एवं स्रोत है। संतुलित समाज संरचना का प्रत्यक्ष रूप व्यवहार एवं उत्पादन की अविभाज्यता है। उत्पादन शिक्षा एवं उसका संरक्षण जितना महत्वपूर्ण है उससे अत्यधिक व्यवहार शिक्षा एवं उसका संरक्षण महत्वपूर्ण है। “व्यवहार, उत्पादन के लिए प्रेरणा है। उत्पादन, व्यवहार के लिए साधन हैं।” यही वास्तविकता है। व्यवहार शिक्षा में अपूर्णता ही उत्पादन-विनिमय उपलब्धियों की अपव्ययता है। मानव का अपव्ययता पूर्वक सामाजिक