138/अभ्यास दर्शन
मानव की परस्परता में विरोध होना पाया जाता है, भले ही वह व्यवहारिक या उत्पादन संबंधी क्यों न हो। विरोध पर विजय ही गुणात्मक परिवर्तन का प्रधान लक्षण है। जीवन समग्र का प्रमाणित हो जाना ही संपूर्ण विरोध का निराकरण है। प्रमाण विहीन ऐच्छिकताएं काल्पनिक सुविधाओं पर आधारित होनी स्वभाविक है। यही वैचारिक वैविध्यता का कारण है और मानव में परस्पर मतभेद है। यह क्रम से वर्ग संघर्ष एवं युद्ध है जो स्पष्ट है। इस तथ्य के आधार पर यह निष्कर्ष मिलता है कि जीवन समग्र का अध्ययन ही ऐसी समस्याओं का समाधान है। मानव जीवन समग्रता, आयाम चतुष्टय की एकात्मकता में तथा पाँचों स्थितियों में दश सोपानीय व्यवस्था की एकरूपता में प्रमाणित है। यही मानव जीवन परंपरा का प्रत्यक्ष रूप है। यही क्रम से संस्कृति एवं सभ्यता है। इसी सीमा में संपूर्ण परस्परताएं विश्लेषित हैं। इन सभी संबंधों एवं संपर्कों का निर्वाह ही मानव परंपरा की ख्याति है। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट होता है कि मूल्यों से अधिक अनुभव करने के लिए वस्तु नहीं है तथा मूल्यों से अधिक विशालता नहीं है। सत्तामयता से अधिक व्यापकता नहीं है। सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति से अधिक विकास एवं जागृति के लिए वस्तु नहीं है। विश्लेषण प्रकृति की सीमा में हुआ है। यह उसकी उपयोगिता एवं उपादेयता को स्पष्ट किया है। गुरु मूल्य के बिना लघु मूल्य का नियंत्रण नहीं है। इसे सत्ता में संपृक्त प्रकृति ने प्रमाणित किया है। इसी तारतम्य में शिष्ट मूल्य का वस्तु मूल्य से गुरु मूल्य होना एवं शिष्ट मूल्य से स्थापित मूल्य का गुरुमूल्य होना प्रमाणित है। आवश्यकताओं के नियंत्रण, संयमन एवं संरक्षण की अपेक्षा में संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकरूपता का होना आवश्यक, अनिवार्य एवं अपरिहार्य है। इसके बिना सर्वमंगल, नित्यशुभ, जीवन सफल एवं भौमिक स्वर्ग संभव नहीं है।
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भोगों में संयमता से अभयता पूर्ण जीवन प्रत्यक्ष होता है।
मानव में भोगवादी प्रवृत्तियों को न्यायवादी प्रवृत्ति में परिवर्तन के बिना अखण्ड सामाजिकता एवं अभयता सर्वसुलभ नहीं है। मानवीयता पूर्ण जीवन के लिए समुचित कार्यक्रम का पाँचों स्थितियों में दश सोपानीय व्यवस्था में क्रियान्वयन होना ही अखण्ड सामाजिकता है, यही मानव का वैभव है। वैभव ही त्राण, प्राण एवं प्रेरणा है। यही परंपरा, प्रमाण एवं इतिहास है। वर्तमान में वैभव आगत के लिए योजना भी है। यही परंपरा की तारतम्यता है। मानव में निहित अमानवीयता का भय ही अखण्डता के लिये घातक है। जीवन परम्परा वास्तविकता के आधार पर गुणात्मक परिवर्तन एवं उसकी निरंतरता को सिद्ध करती