मानव अभ्यास दर्शन

आवेश (लाभोन्माद, कामोन्माद, भोगोन्माद) मानव की स्वभाव गति नहीं है।

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मध्यस्थ दर्शन ( अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/149

कार्यक्रम में स्पष्ट है। यही अक्षुण्णता का तात्पर्य है। वैभव ही तीनों काल में कीर्तिमान होता है। अमानवीयता की कीर्ति प्रमाण सिद्ध नहीं है। अमानवीय कामना बराबर निषेध, मानवीयता पूर्ण कामना बराबर विधि तथा अतिमानवीयता पूर्ण कामना बराबर आप्त कामना है। मानव में अमानवीयता स्वीकार्य नहीं है इसलिए निषेध है। मानवीयता, मानव में स्वीकार्य है इसलिए विधि है। अतिमानवीयता सर्वोच्च विकास है इसलिए आप्त कामना है। निषेध का उन्मूलन विधि से होता है। आप्त कामना में विधि का प्रकटन होता है। यह आप्त कामना की प्रत्यक्ष गरिमा है। विधि का प्रकटन न होने की स्थिति में वह आप्त कामना नहीं है। विधि का प्रकटन ही जीवन सफलता के लिए मार्गदर्शन है तथा नीति जीवन सफलता के लिए कार्यक्रम है। विधि से नीति की निष्पत्ति नैसर्गिक वास्तविकताओं के आधार पर होती है। विधि में अनुगमन ही गुणात्मक परिवर्तन है जो प्रमाणित है। प्रमाण अपरिवर्तनीय होने के कारण वैभव सिद्ध होता है।

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आवेश ( लाभोन्माद, भोगोन्माद, कामोन्माद ) मानव की स्वभाव गति नहीं है।

आवेशित गति एवं स्वभाव गति प्रसिद्ध है। चैतन्य क्रिया में स्वभाव गति पूर्वक ही गुणात्मक परिवर्तन होता है। प्रत्येक घटना अपनी स्थिति को प्रकट करती है। संपूर्ण प्रकटन आवेशित गति एवं स्वभाव गति के रूप में दृष्टव्य है। आवेश के लिए अन्य का आक्रमण होना आवश्यक है। मानव को सफलता के लिए स्वभाव गति में ही रहना अनिवार्य है। इसके लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रक्रिया प्रसिद्ध है। व्यक्ति ने अनावश्यक वातावरण से निष्प्रभावित रहने का प्रयास किया है। ऐसा प्रयास साधारण कठोर एवं कठोरतम पद्धतियों से सम्पन्न किया जाना हुआ है। इन सबका उद्देश्य उनके लक्ष्य के विपरीत प्रभावदायी तत्वों से निष्प्रभावित होना और अभीष्ट को पाना रहा है। फलतः व्यक्तिगत रूप में गुणात्मक परिवर्तन होना रहा है। वह लोक सामान्य नहीं होने के कारण आदर्श में गण्य रहा है। इसी कारणवश मानव में जागृति का प्रमाण चेतना विकास मूल्य शिक्षा व दश सोपानीय व्यवस्था पद्धति में पूर्णता को प्रदान करने में समर्थ नहीं हुआ अथवा उस समय के लिए आवश्यकता नहीं रही। आवश्यकता के बिना उपलब्धि का लक्ष्य एवं उसके लिए विधिवत् प्रयास नहीं है। वर्तमान में वास्तविकता मानवता की सर्वसुलभता के लिए अनिवार्यता को स्पष्ट कर रही है। यही सत्यता मानव को आवेशमय अमानवीयतावादी जीवन से संक्रमित होकर मानवीयता पूर्ण जीवन में सर्वतोमुखी कार्यक्रम को प्रसूत करने के लिए बाध्य की है। आवेश जीवन का लक्ष्य या गुणात्मक परिवर्तन के लिए