मानव अभ्यास दर्शन

व्यक्तित्व और प्रतिभा की चरमोत्कर्षता में ही प्रेमानुभूति होती है।

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मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/153

से प्रेमानुभूति पर्यन्त क्षमता को जागृत करता है। “स्थापित मूल्यानुभूति क्रम में ही प्रेमानुभूति है।” यह क्रम से ममता, स्नेह, विश्वास, कृतज्ञता, वात्सल्य, सम्मान, गौरव, श्रद्धा एवं प्रेम है। सामाजिकता में परिपूर्णता ही प्रेमानुभूति योग्य क्षमता है। स्वतंत्रतापूर्वक सामाजिकता का आचरण ही सामाजिकता की परिपक्वता है। स्वतंत्रता ही प्रेमानुभूति का प्रधान लक्षण है। “प्रेमानुभूति में वैविध्यता नहीं है।” अन्य सभी स्थापित मूल्य प्रेमानुभूति में, से, के लिए सोपान है। वस्तु मूल्य एवं शिष्ट मूल्य स्थापित मूल्य में समर्पित होने के लिए बाध्य है। अनुभव का तात्पर्य क्रम पूर्वक प्राप्तोत्पत्ति ही है। मानव में क्रमानुभूति केवल “मूल्य त्रय” ही है। वस्तु मूल्य से शिष्ट मूल्य वरीय, शिष्ट मूल्य से स्थापित मूल्य अति वरीय है। स्थापित मूल्य में से प्रेम पूर्ण मूल्य है। इसी सत्यता से स्पष्ट परिज्ञान होता है कि प्रेमानुभूति के अनन्तर ही वास्तविकताएं स्पष्ट होती हैं। प्रकृति की सीमा में वास्तविकताएं होती है। “प्रेममयता की अनुभूति कृतकृत्यता है।” और कुछ करना शेष न हो, यही कृतकृत्यता है। गुणात्मक परिवर्तन के संदर्भ में, से, के लिए ही दायित्व एवं कर्तव्य प्रमाणित होते हैं। अनुभवमय क्षमता से संपन्न होने पर्यन्त दायित्व एवं कर्तव्य का अभाव नहीं है। उसके अनन्तर वह स्वभावगत होता है। अमानवीयता से मानवीयता में अनुगमन करने के लिए “नियम त्रय” पूर्वक दायित्व एवं कर्तव्य प्रमाणित होता है। मानवीयता से अतिमानवीयता में अनुगमन करने के लिए छः स्वभाव कर्तव्य एवं दायित्व को प्रमाणित करते हैं। धीरता से परिपूर्ण होना ही वीरता का होना, वीरता से परिपूर्ण होना ही उदारता का होना, उदारता से परिपूर्ण होना ही दया का होना, दया से परिपूर्ण होना ही कृपा का होना तथा कृपा से परिपूर्ण होना ही करूणा का होना प्रमाणित है।

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व्यक्तित्व और प्रतिभा की चरमोत्कर्षता में ही प्रेमानुभूति होती है।

श्रृंगार व कामुकता प्रेमानुभव करने का साधन नहीं है अथवा वे इसके लक्षण नहीं हैं। प्रेम आवेश नहीं है। प्रेम अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति एवं अव्याप्ति दोष से मुक्त है। कामुकता प्रच्छन्न रूप में आवेश है अर्थात् सम्मोहनात्मक आवेश है। “प्रेमानुभूति में तन्मयता एवं अनन्यता स्वभावाभिव्यक्ति है।” अनन्यता ही अखण्ड सामाजिकता का द्योतक है। सामाजिकता की वास्तविकता ही अखण्डता है। प्रेमानुभूतिमयता में ही जीवन चरितार्थता एवं अभयता सिद्ध होती है। “मानव ही प्रेमी और प्रेमास्पद होने के लिए अर्ह है।” प्रकारान्तर से मानव जैसे ही प्रतीक प्रसिद्ध है। मानव ही मानव के लिए प्रेमानुभूति का सुलभ उपाय है। प्रेमानुभूति योग्य क्षमता में सामाजिकता का प्रकट होना स्वाभाविक है। स्वभाव ही इसका मूल रूप है।