मानव अभ्यास दर्शन

प्रमाण त्रय ही विश्वास है।

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मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/159

जाने वाली एक वास्तविकता है। यह प्रमाण सिद्ध हुआ है। इसी के आधार पर मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था का विश्लेषण हुआ है।

“परिणाम में ही गठन पूर्णता की महत्ता, श्रम में ही विश्राम की आवश्यकता एवं गति में ही गन्तव्य की अनिवार्यता प्रकट है।” गठन पूर्णता गणित के प्रयोग से सिद्ध होती है। क्रिया पूर्णता व्यवहार पूर्वक सिद्ध होती है। आचरण पूर्णता अनुभव पूर्वक सिद्ध होती है। ये सिद्धियाँ ही प्रमाण है। “पूर्णता त्रय” से अधिक मानव जीवन में अध्ययन प्रमाणित नहीं है। इन्हीं में, से, के लिए ही विधिवत् अध्ययन होना ज्ञानावस्था की विशेषता है। ज्ञानावस्था में ही अध्ययन पूर्ण होता है। अध्ययन पूर्णता ही समाधान है। अध्ययन पूर्णता निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य ही है। अध्ययन ही “प्रमाण त्रय” को प्रसारित करता है।

“प्रमाण त्रय ही संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकसूत्रता का सूत्र है।” भोग और व्यापार मूलक क्षमता सार्वभौमिक संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था को प्रकट करने में असमर्थ है। “प्रमाण त्रय” पूर्वक ही मानव एवं मानवीयता की वास्तविकता स्पष्ट होती है। मानव के बिना मानवीयता तथा मानवीयता के बिना मानव की वास्तविकता स्पष्ट नहीं है। मानवीयता की अपेक्षा में ही अमानवीयता एवं अतिमानवीयता का अध्ययन होता है। अध्ययन ही वास्तविकता का दर्शन है। वास्तविकता विकास क्रमोपस्थिति है। प्रमाण ही सिद्धांत का प्रत्यक्ष रूप है जो जीवन है। प्रयोग, व्यवहार, समाधान एवं अनुभूति से अधिक जीवन नहीं है।

49.

प्रमाण त्रय ही विश्वास है।

मानव में परिवार से अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में, से, के लिए विश्वास विहीनता ही अपूर्णता है। अपूर्णता अविश्वास का द्योतक है। जीवन में अपूर्णता ही अध्ययन में अपूर्णता, अध्ययन में अपूर्णता ही प्रतिभा व व्यक्तित्व में अपूर्णता, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व में अपूर्णता ही प्रबुद्धता में अपूर्णता, प्रबुद्धता में अपूर्णता ही प्रमाणिकता में अपूर्णता, प्रमाणिकता में अपूर्णता ही सामाजिकता में अपूर्णता, सामाजिकता में ही अपूर्णता ही वर्गीयता, वर्गीयता ही जीवन में अपूर्णता है। यही अपूर्णताएं अविश्वास अथवा विश्वास विहीनता है। इसके स्थान पर जीवन में पूर्णता ही अध्ययन में पूर्णता, अध्ययन में पूर्णता ही प्रतिभा एवं व्यक्तित्व में पूर्णता, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व में पूर्णता ही प्रबुद्धता में पूर्णता, प्रबुद्धता में पूर्णता ही प्रमाणिकता में पूर्णता, प्रमाणिकता में ही पूर्णता ही सामाजिकता में पूर्णता, सामाजिकता में पूर्णता ही वर्ग