मानव अभ्यास दर्शन

सामाजिकता का अध्ययन

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20/अभ्यास दर्शन

निश्चित लक्ष्य उचित कार्यक्रम को पहचानने एवं सम्पन्न करने में मानव समर्थ है।

औचित्यता मानवीयता पूर्ण पद्धति से सिद्ध होती है, जो स्पष्ट दर्शन क्षमता पर आधारित है। यही विश्लेषण है।

अतिमानवीयता या अमानवीयता की अपेक्षा में ही मानवीयता का निर्धारण होता है। साथ ही इसी सीमा में विश्लेषण भी पूर्ण होता है।

मानव के चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों की एकसूत्रता ही अभयता, समाधान एवं समृद्धि है।

5.

सामाजिकता का अध्ययन

मनुष्य सामाजिकता के अध्ययन के लिए उत्साही है, मानव में, से, के लिए नहीं है। समाज का केन्द्र मनुष्य है। मानव जीवन चारों आयामों की एकसूत्रता है, जो स्थितिवता है।

अध्ययन स्थितिवता का ही है। स्थितिवता ही सत्यता है। जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति की स्थितिवता है। ज्ञानावस्थित मानव में ही अध्ययन क्षमता की विपुलता दृष्टव्य है। जो विकासक्रम उपलब्धि है, जिसका विश्लेषण हो चुका है।

स्थितिशील प्रकृति, स्थिति पूर्ण सत्ता ही प्रत्यक्ष है। स्थितिशीलता में ही वैविध्यता है, जो प्रकृति की सीमा है। स्थिति पूर्ण केवल सत्ता है यह अस्तित्व पूर्ण है। इसी में अनुभव जागृत ज्ञानावस्था सहज इकाई में होता है। स्थितिशील प्रकृति में परस्परता, प्रभाव, प्रतिभाव, व्यंजना एवं प्रतिव्यंजनात्मक क्षमता ही जागृत होकर दर्शन एवं प्रतिदर्शन क्रिया को प्रकट करती है। यही क्षमता स्थितिवता का अन्वेषण करने के लिए बाध्य करती है, साथ ही स्थितिपूर्ण में अनुभूति के लिए भी।

दर्शन क्षमता प्रत्येक मानव में किसी न किसी अंश में पायी जाती है। दर्शन क्षमता के गुणात्मक जागृति की अभिलाषा से शिक्षा एवं अध्ययन की अनिवार्यता सिद्ध हुई है।

संपूर्ण अध्ययन स्थितिवता का दर्शन, दर्शन ही ज्ञान एवं ज्ञान ही अनुभव है। अनुभव ही सत्य है और सत्य अपरिणामी है। प्रयोग और व्यवहार पूर्ण सिद्ध प्रमाण भी अनुभव ही है।