मानव अभ्यास दर्शन

अभ्यास समग्र की उपलब्धि क्रियापूर्णता, आचरण पूर्णता ही है।

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164/अभ्यास दर्शन

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अभ्यास समग्र की उपलब्धि क्रिया पूर्णता एवं आचरण पूर्णता ही है।

इससे अधिक मानव के लिए उपलब्धियाँ शेष नहीं हैं। इनके अतिरिक्त और किसी प्रकार की सिद्धि की चर्चा रहस्यमयता ही है। रहस्यमयता की चर्चा रहस्योन्मूलन के लिए सहायक नहीं है। रहस्य से रहस्य का निराकरण नहीं है। यथार्थता की श्रृंखला में “अज्ञात” रहना संभव नहीं है। अज्ञातता रहस्य नहीं है। क्रम से ज्ञान उदय होने की संभावना है। सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के अतिरिक्त और कोई वास्तविकता नहीं है। मानव जीवन जो जागृति के क्रम में प्रत्यक्ष है, उनमें गुणात्मक परिवर्तन पूर्वक क्रिया पूर्णता एवं आचरण पूर्णता सिद्ध होता है। उसके अतिरिक्त कल्पनात्मक श्रेष्ठ सिद्धि अथवा नेष्ठ सिद्धि दोनों ही सामाजिकता को सिद्ध करने में समर्थ नहीं हैं। हिंसक एवं अनिष्टकारी अथवा प्रलोभनात्मक प्रक्रिया या उसके लिए किया गया अभ्यास भी अमानवीयता ही है। यही रहस्यमयता है। ऐसी सिद्धियों के प्रति तीव्र इच्छा के मूल में स्वयं में रहस्यता का होना आवश्यक है। स्वयं में रहस्यता के बिना रहस्यता प्रिय होना संभव नहीं है। स्वयं में रहस्यता अमानवीय तथा विजय पाने, आक्रमण करने एवं सुविधा संग्रह करने के संदर्भ में होता है। स्वयं के जागृति क्रम एवं कार्यक्रम तथा उसकी प्रतिष्ठा के संदर्भ में पूर्ण बोध न होना ही इसका कारण है।

भौतिकवादी चिन्तन के आनुषंगिक जो रासायनिक एवं भौतिक प्रक्रियाएं विश्लेषण पूर्वक स्पष्ट हुई हैं, उनमें मानव का विश्लेषण न होना, साथ ही भौतिकता को जीवन सर्वस्व क्रियाकलाप स्वीकार किया जाना अमानवीयता के लिए परमावधि प्रोत्साहन सिद्ध हुआ है। भौतिकवादी चिन्तन जड़ प्रकृति का अध्ययन है। मानव जड़ प्रकृति में सीमित नहीं है। जड़ प्रकृति पर चैतन्य प्रकृति का अधिकार एक वास्तविकता है। चैतन्य प्रकृति के स्पष्ट अध्ययन के बिना मानव का अध्ययन अपूर्ण है। अपूर्ण अध्ययन पूर्वक पूर्ण जीवन को अभिव्यक्त करना संभव नहीं। यही अपूर्णता वर्ग में परिणत होता है। अपूर्णता सार्वभौमिक होना संभव नहीं है। अस्तु, मानवीयता पूर्ण जीवन पद्धति, प्रणाली एवं नीति पूर्वक ही मानव अखण्डता का अनुभव करता है।

“चिदानन्द, आत्मानन्द एवं ब्रह्मानन्द ही परमावधि उपलब्धि है।” यही अभ्यास का संपूर्ण लक्ष्य है। चिदानन्द का प्रधान लक्षण अभय है। यही सजगता सतर्कता की सर्वोच्च उपलब्धि है। ये सब क्रिया पूर्णता के द्योतक हैं। इसका प्रत्यक्ष रूप ही सामाजिकता है। अभाव के अभाव में ही चिदानंदानुभूति होती है। चिदानन्द का आधार समाधान ही है। क्रिया पूर्णता में समाधान स्वभाव सिद्धि है। विधिवत् अभ्यास की प्रथमोपलब्धि चिदानंद है। चिदानंद ही पूर्ण सामाजिकता को प्रकट करता है अथवा चिदानंद की उपलब्धि पूर्ण सामाजिकता है।