मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/167
कार्यक्रम है वे मानव में गुणात्मक परिवर्तन के लिए अथवा वास्तविकताओं को स्पष्ट करने में समर्थ नहीं है। वास्तविकताएं भय या प्रलोभन नहीं है। वास्तविकताएं केवल गुणात्मक परिवर्तन के लिए बाध्यता एवं उसके अनुसरण में केवल समाधान है। समाधानमयता के लिए बाध्यता एवं उसके अनुसरण में केवल समाधान है। समाधानमयता ही मानव में सुख, शांति एवं संतोष को प्रमाणित करती है।
पुनर्जन्म के पक्ष-विपक्ष में जो कुछ भी रहस्यात्मक चर्चा है उसका निराकरण वास्तविकता पर आधारित है। वास्तविकता सत्ता में सम्पृक्त जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। विकास क्रम में पायी जाने वाली गठन पूर्णता अमरत्व को स्पष्ट करती है। क्रिया पूर्णता स्वर्ग, स्वर्गीयता, समाधान एवं समृद्धि को प्रकट करती है। आचरण पूर्णता भ्रम मुक्ति एवं परमानंद को प्रमाणित करती है। ये वास्तविकताएं अभ्युदय में पाये जाने वाले तथ्य हैं।
“अभ्यास केवल वास्तविकताओं के अनुसंधान एवं अनुभव के लिए कार्यक्रम है।” कार्यक्रम सघन व्यवस्था है। सघन व्यवस्था स्वयं प्रक्रिया है। स्वयं प्रक्रिया स्वभावाभिव्यक्ति है। स्वभावाभिव्यक्ति ही नियंत्रण है। नियंत्रण ही सत्तामयता में संपृक्तता है। सत्तामयता में नियंत्रण ही अनुभूति है। सत्तामयता में अनुभूति ही चैतन्य प्रकृति की विशालता है। सत्तामयता के अर्थ में व्यापक शब्द प्रायोजित है। प्रकृति की अभ्युदय पूर्णता ही सत्तामयता में अनुभूति है। अभ्युदय पूर्णता ही जागृति पूर्णता है। जागृति पूर्णता ही सतर्कता एवं सजगता है। सतर्कता एवं सजगता ही अभ्यास का चरमोत्कर्ष है। सतर्कता व्यवहार पूर्णता एवं सजगता ही अनुभव पूर्णता का द्योतक है।
53.
मानव जीवन में भक्ति जागृति के अर्थ में वांछित प्रक्रिया है।
भजन एवं सेवा का योगफल ही भक्ति है। भय से मुक्त होने के लिए किया गया कायिक, मानसिक एवं वाचिक क्रियाकलाप ही भजन है। तदानुकूल व्यवहार एवं आवश्यकता से अधिक उत्पादन तथा शेष का विधिवत् विवरण एवं परिचर्या ही सेवा है। भय मुक्ति के लिए परम सत्य में तन्मयता ही प्रधान आधार है। यह भक्ति की विशेषता है। तन्मयता ही क्रम से तदात्मयता एवं तद्रूपता भी है। इसके मूल में अर्पण-समर्पण अनिवार्य है। यह जागृत के साथ अर्पण-समर्पण पूर्वक ही चरितार्थ होती है। समर्पण का तात्पर्य पूर्णता हेतु प्रस्तुत होने से तथा