मानव अभ्यास दर्शन

योगाभ्यास जागृति के अर्थ में चरितार्थ होता है।

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168/अभ्यास दर्शन

अर्पण का तात्पर्य सेवा-सुश्रुषा से है। इनकी चरितार्थता उसी स्थिति में प्रत्यक्ष होती है जब जो जिसमें अर्पित-समर्पित होता है उसकी क्षमता तथा अर्पण-समर्पण की पूर्णता के योगफल में भक्ति चरितार्थ होती है अर्थात् तन्मयता से तदात्मयता तथा तदात्मयता से तद्रूपता सिद्ध होती है। जिसका प्रत्यक्ष रूप गुणात्मक परिवर्तन ही है। गुणात्मक परिवर्तन सिद्ध न हो ऐसी तद्रूपता, तदात्मयता एवं तन्मयता की मौलिकता सिद्ध नहीं होती है। गुणात्मक परिवर्तन का प्रमाण मानवीयता, देव मानवीयता एवं दिव्य मानवीयता में प्रमाणित होता है। जागृति ही तन्मयता का मूल उद्देश्य है अथवा उसकी चरितार्थता है। जागृति पूर्वक ही यह प्रमाणित होती है। जागृति न होने की स्थिति में इन सब प्रयासों का निरर्थक होना भावी है। निरर्थकता मानव की वांछित उपलब्धि नहीं है। उससे यह स्पष्ट होता है कि भक्ति में सफलता उभयाधिकार पर निर्भर करती है। सफलता ही प्रमाण एवं परम्परा है। क्रिया पूर्णता एवं आचरण पूर्णता ही जीवन का चरमोत्कर्ष है। पूर्णता से अधिक उपलब्धि प्रमाण सिद्ध नहीं है। पूर्णता के लिए ही जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति श्रम, गति, परिणामशील है। पूर्णता से अधिक मानव में, से, के लिए आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता विहीन उपलब्धि के लिए प्रयास नहीं है। यदि है, सफल नहीं है। स्थापित मूल्य का अनुभव सहित शिष्टता पूर्ण आचरण ही भय मुक्ति का प्रत्यक्ष रूप है। स्थापित मूल्यानुभूति एवं शिष्टता के बिना भय मुक्ति नहीं है। भय मुक्ति के लिए तन्मयता में प्रसक्ति है। यह क्रम से अमानवीयता से विवश इकाई के लिए मानवीयता पूर्ण सेव्य, मानवीयता पूर्ण इकाई के लिए देव मानवीयता पूर्ण सेव्य, देव मानवीयता पूर्ण इकाई के लिये दिव्य मानवीयता सेव्य अथवा दिव्य मानवीयता पूर्ण इकाई अन्य सब के लिए सेव्य और देव मानवीयता पूर्ण इकाई अमानव एवं मानव के लिए सेव्य होना प्रसिद्ध है। यही सफलता है। पूर्ण मूल्यानुभूति ही भक्ति की पराकाष्ठा है।

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योगाभ्यास जागृति के अर्थ में चरितार्थ होता है।

यह मानवीयतापूर्ण जीवन के साथ आरंभ होता है जो श्रवण, मनन एवं निदिध्यास पूर्वक अथवा धारणा, ध्यान एवं समाधि पूर्वक चरितार्थ होता है। जीवन चरितार्थता ही आचरण पूर्णता है। योगाभ्यास शास्त्राध्ययन, उपदेश एवं स्वप्रेरणा का योगफल है। इन सब में प्रमाणिकता का होना अनिवार्य है। मानवीयता पूर्ण जीवन के साथ वांछित वस्तु देश एवं तत्व में चित्त-वृत्तियों का संयत होना पाया जाता है। यही धारणा है। धारणा पर पूर्णाधिकार के अनंतर उसके