मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/21
दर्शन विहीन प्रयोग व व्यवसाय सिद्ध नहीं है।
अध्ययन के लिए जो प्रत्यक्ष संभावना है वह केवल उत्पादन, व्यवसाय, व्यवहार एवं उसके लिए समुचित क्षमता की सीमा में है, जो दर्शन ज्ञान और अनुभव ही है।
विश्लेषित स्वीकृत होना ही अध्ययन है। रूप, गुण, स्वभाव और धर्म की प्रत्यक्षानुभूति ही विश्लेषण है, जो स्थितिवता व सत्य है। अस्तु, अध्ययन का फलन ही अनुभव है। अनुभव विहीन प्रत्येक उत्पादन कार्य में त्रुटि एवं व्यवहार कार्य में गलती अथवा अपराध भावी है।
त्रुटि एवं अपराध मानव की वांछित प्रस्तुति नहीं है। यह प्रस्तुति तब तक रहेगी जब तक अध्ययन पूर्ण न हो जाय, प्रत्येक मानव में अध्ययन प्रवृत्ति जन्म से ही पाई जाती है। इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि उत्पादन और व्यवहारिक अध्ययन को संतुलित रूप में संपन्न करना अनिवार्य है।
न्यायपूर्ण व्यवहार व शिक्षा मानवीयता में प्रत्यक्ष है। गुणात्मक स्थितिवता की उपेक्षा ही अज्ञान, अभाव, असमर्थता एवं अक्षमता है। अज्ञानी को ज्ञानी में, अभाव को भाव में, असमर्थ को समर्थ में, अक्षम को सक्षम में परिवर्तित, परिमार्जित करने के लिए शिक्षा एवं व्यवस्था है।
6.
सामाजिकता का आचरण
सामाजिकता का अध्ययन एवं अभ्यास अनिवार्य साधना है। मानव पाँच स्थितियों में गण्य है, जिसमें से तीन मूलरूप है - 1. व्यक्ति, 2. परिवार, 3. समाज, इसी के परिवर्तित दो रूप हैं - 4. राष्ट्र, 5. अंतर्राष्ट्र।
इन पाँचों स्थितियों का आचरण परस्पर पूरक है। यह दश सोपानीय व्यवस्था में स्पष्ट है।
आशा एवं आकाँक्षापूर्वक किया गया क्रियाकलाप ही आचरण है। आशयपूर्वक स्वादन क्रिया ही आशा है। जिस स्वादन के बिना सहअस्तित्व में दृढ़ता व सुरक्षा नहीं है, उसकी अपेक्षा ही स्वादन क्रिया का आशय है। मूल्य रुचि ग्राही क्रिया ही स्वादन है। मानव में संचेतना और गति का संयुक्त रूप ही क्रिया है। ऐसी क्रियाओं का समूह ही क्रियाकलाप है। मन में