मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)/27
निरंतर है, जो प्रसिद्ध है। इसलिए आवश्यकताएं सामान्य एवं महत्वाकांक्षा की सीमा में ही हैं। इन सब का उपयोग समाज गति के अर्थ में सामयिक है। इसलिए संबंधों के निर्वाह में ही वस्तुओं के उपयोग, सदुपयोग व वितरण प्रयोजन की सीमा में समाहित हैं।
7.
स्थापित मूल्यों की अनिवार्यता सर्वदा सबके लिए समान है।
स्थापित संबंधों में निहित स्थापित मूल्यों का परिवर्तन किसी भी देश, काल व स्थिति में नहीं है। यही स्थायित्व का लक्षण और अनिवार्यता का मूल कारण है। इस प्रकार के स्थापित मूल्य प्रधानतः नौ हैं, जो निम्न प्रकार है :-
1.कृतज्ञता 2. गौरव 3. श्रद्धा 4. प्रेम 5. विश्वास 6. वात्सल्य 7. ममता 8. सम्मान 9. स्नेह।
ये ही नौ सामाजिक मूल्य मानवीयता सहज प्रयोजन में प्रत्येक व्यक्ति के आचरण के आधार है। इनमें से विश्वास “साम्य” मूल्य है और “प्रेम” पूर्ण मूल्य है। व्यवहार निर्वाह काल में उक्त स्थापित मूल्यों के साथ आचरण प्रक्रिया (शिष्टता) रहती है, जो क्रमशः सौम्यता, सरलता, पूज्यता, अनन्यता, सौजन्यता, सहजता, उदारता, सौहार्द्रता तथा निष्ठा है। यही शिष्टता है, जो स्थापित मूल्य में समर्पित रहती है, जो प्रसिद्ध है।
शिष्टता पूर्वक स्थापित मूल्य निर्वाह के बिना मानव में अखण्डता व उसकी अक्षुण्णता संभव नहीं है।
सामाजिक स्थापित मूल्य शिष्टता के साथ व्यवहारिक सुगमता के रूप में हैं, जो बौद्धिक समाधान है। शरीर निर्वाह संरक्षण एवं संवर्धन के लिए भौतिक समृद्धि की आवश्यकता है। इन आवश्यकताओं को साम्यतः पाया जाता है।
भौतिक समृद्धि के लिए ही मानव उत्पादन करता है, जिसकी उपयोगिता महत्वाकांक्षा व सामान्य आकांक्षा की सीमा में निहित है। यह भी जीवन का अविभाज्य आयाम है। यह स्पष्ट है कि उत्पादन ही मानव जीवन का सर्वस्व नहीं है। यही कारण है कि मानव सामाजिक, आर्थिक, राज्यनीति को पालन करने के लिए बाध्य है।