28/अभ्यास दर्शन
व्यवहारात्मक जनवाद का आधार केवल “न्याय” ही है, क्योंकि प्रत्येक मानव जन्म से ही न्याय का याचक है। यही “नीतिव्रय” की समन्वयता की एकसूत्रता का भी कारण है साथ ही जनवादी चिंतन, निरीक्षण व स्पष्टीकरण का आधार भी है। व्यवहार का आधार न्याय ही है।
मानव की परस्परता में आश्वस्त एवं विश्वस्त होने का आधार न्याय ही है।
अखण्ड समाज परंपरा में स्थापित मूल्य का निर्वाह ही शिष्टता की अभिव्यक्ति तथा “अर्थ” का सदुपयोग है। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जीवन में एकसूत्रता ही “न्याय” है। यही सार्वभौम कामना है, जो व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार में, परिवार के सहयोग एवं सहकार्य में, समाज के प्रोत्साहन एवं प्रेरणा में, राष्ट्र के संरक्षण तथा संवर्धन में एवं अंतर्राष्ट्रीयता के अनुकूल परिस्थिति एवं एकसूत्रता में चरितार्थ होती है। यही सर्व मानव की कामना, मांगल्य, शुभ, संगीत, वांछनीय अनिवार्यता, ऐतिहासिक उपलब्धि, नियतिक्रम स्थिति, अखण्डता, अभयता, सतर्कता एवं स्वर्ग है।
अखण्ड समाज परंपरा में स्थापित मूल्यों के निर्वाह में ही शिष्टताएं समर्पित हैं। “अर्थ” का सदुपयोग मानवीयता में चरितार्थ होता है, जो जागृति क्रम में पायी जाने वाली सुखद स्थिति है, क्योंकि देव पद चक्र में सामाजिकता है, जबकि भ्रांति पद चक्र में यह नहीं है।
शिष्टता में वैविध्यता की संभावना देश कालवश है। “अर्थ” के सदुपयोग में तथा स्थापित मूल्यों में विकल्प नहीं है। यही अखण्डता एवं अक्षुण्णता का मूल तथ्य है। इससे ही अनुप्राणित जीवन नित्य कार्यक्रम, उत्सव, समृद्धि, समाधान, उत्साह, सफलता, स्थिरता, शान्ति, संतोष एवं सुख का अनुभव करता है। यही कामना मानव में अनन्त काल से है।
8.
जनाकाँक्षा को सफल बनाने योग्य शिक्षा व व्यवस्था
“जन्म से प्रत्येक व्यक्ति न्याय का याचक है, साथ ही न्याय प्रदान करने में असमर्थ है।” वह सही कार्य व्यवहार करना चाहता है, भ्रमवश गलती और अपराध करता है। साथ ही वह भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान चाहता है, उसमें स्वयं को असमर्थ पाता है। (समस्या और दरिद्रता से पीड़ित रहता है। इसी तथ्यवश मनुष्य शिक्षा व व्यवस्था में समर्पित