मानव अभ्यास दर्शन

समाज व्यवस्था

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32/अभ्यास दर्शन

मूल्य में, से, के लिए ही मानव प्रकारान्तर से समर्पित है।

संबंध व स्थापित मूल्य केवल अखण्ड समाज के अर्थ में है, अखण्ड समाज सहअस्तित्व में अनुभव का फलन है जो केवल अनुभव प्रमाण से तथा उत्पादन मूल्य प्रयोग प्रमाण से प्रमाणित है, जिसका उपयोगिता मूल्य दृष्टव्य है।

जड़-चैतन्यात्मक इकाईयों की स्थिति-गति केवल मूल्यों में, से, के लिए ही है। सभी अवस्था और पद में प्रतिष्ठित इकाईयों का मूल्य उन-उन के स्वभाव और आचरण के आधार पर गण्य है।

मानव में जो मूल्य दर्शन क्षमता है, वही मानव को व्यवहार, उत्पादन, विचार एवं अनुभूति में, से, के लिए प्रेरित करती है। यही सामाजिकता एवं बौद्धिकता का आधार है। मानव सामाजिक, न्यायिक इकाई एवं बुद्धिपूर्वक (समझदारी पूर्वक) जीने वाला अर्थात् ज्ञान विवेक विज्ञान पूर्वक जीने वाला से भी संबोधित है, इस संबोधन का अभीष्ट भी इसी क्षमता का निर्देश करता है।

सामाजिक एवं बौद्धिक सफलता के लिए मानव ने अनवरत प्रयास किया है क्योंकि इन दोनों शब्दों का प्रयोग आयाम प्रभेद को इंगित करता है। समाज शब्द व्यवहारिक आयाम को एवं बौद्धिक शब्द वैचारिक आयाम को स्पष्ट करता है। मानव जन्म से ही सामाजिकता के लिए प्रेरित है, जिसका प्रबोधन संस्कृति करती है साथ ही बौद्धिक समाधान के लिए भी।

9.

समाज व्यवस्था

अखण्ड समाज दश सोपानीय व्यवस्था है, यही जागृत मानव परंपरा सहज वैभव है। समाज तीन रूपों में गण्य हैं :-

समाज का प्राथमिक रूप : समझदार परिवार

समाज का द्वितीय रूप : अखण्ड समाज (राष्ट्र)

समाज का तृतीय रूप : मानव (पृथ्वी) अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था