मानव अनुभव दर्शन
अध्याय - चार
•संस्कारपूर्वक ही मूल प्रवृत्तियों का उदय होता है परिमार्जन पूर्वक ही पुनराभिव्यक्ति होती है।
•अनुभूति योग्य अर्हता को उत्पन्न कर देना ही संस्कार है।