मानव में कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता से समझदारी, ईमानदारी और भागीदारी पर्यन्त जो अध्ययन, प्रयोग और प्रमाण वैभव है, केवल मानव में ही प्रमाणित है। यह सर्व मानव में, से, के लिये समान है; चाहे छोटा हो, बड़ा हो, दुर्बल हो, पतला हो, गोरा हो, काला हो, धरती के किसी भी अंगभूत देशों में हो, काल में हो; सभी मानव में समझदारी की सम्भावना, उपलब्धि सम्भावना समीचीनता समान है। उपलब्धि का प्रमाण, यह मानव परम्परा में व्यवस्था पूर्वक स्पष्ट होने का सम्पूर्ण गौरवमयी ढांचा खांचा होना पाया जाता है। ऐसा ढांचा खांचा अथवा यह वैभव मानव का परावर्तन-प्रत्यावर्तन विधि से प्रमाणित हो पाता है। इसका दूसरा कोई मापदण्ड व प्रक्रिया होता नहीं। समझदारी का परावर्तन-प्रत्यावर्तन प्रयोजन के चलते मानव अपने में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में सूत्र और व्याख्या परावर्तित-प्रत्यावर्तित होना ही प्रमाण है। यही अध्ययन, अध्यापन, मूल्य, मूल्यांकन, समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व के रूप में प्रमाणित होना, सर्वथा सुलभ व स्वीकृत है। यह प्रमाणित होना ही परावर्तन-प्रत्यावर्तन का प्रयोजन है। यही मानव परंपरा का भी प्रयोजन है। यही नियति विधि से गम्य स्थलीय है। यही सर्व मानव की आवश्यकता है।
13. दबाव, प्रवाह, तरंग, विद्युत चुम्बकीय बल
दबाव - स्वभाव गति से भिन्न, सम विषम आवेश के लिए प्राप्त विवशतायें दबाव है।
प्रवाह - निरन्तर रस द्रव्य का ढाल की ओर गति प्रवाह है।
तरंग - ठोस, तरल, विरल में भिन्न-भिन्न रूप में भिन्न-भिन्न तरीके से तरंग होना पाया जाता है। ठोस वस्तु में कम्पनात्मक गति के रूप में तरंग है। तरल (पानी) में हवा के संयोग से अथवा किसी पदार्थ, जीव-जानवर, मानव के संयोग से उत्पन्न प्रतिक्रिया तरंग के रूप में है। जैसे, मानव के पत्थर फेंकने से, कूदने से, हवा के दबाव से पानी कम्पनात्मक गति (ऊपर नीचे होता है) सहित दौड़ता है। यही तरंग के नाम से जाना जाता है। विरल वस्तु में शब्द, ताप, विद्युत, किरण, विकिरण तरंग रूप में प्रमाणित होते है।
विद्युत तरंग- यह चुम्बकीय धारा के विखंडन से उत्पन्न प्रवाह है। चुम्बकीय धारा जिन छोटे-छोटे रूप में विखंडित हो पाते हैं, वे टुकड़े किसी माध्यम से सम्प्रेषित होते हैं, अर्थात् दौड़ते हैं। माध्यम के बारे में, संपूर्ण प्रकृति विद्युत धारा का धारक वाहक होना पाया जाता है। संपूर्ण प्रकृति