पर जो तकनीकी विद्या है इसमें उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता तथा प्रकृति का अनानुपाती शोषण न हो इसके सुनिश्चित होने की आवश्यकता नहीं है।
14. देश, दिशा, दूरी, विस्तार आयाम, कोण
हर मानव इन सभी मुद्दों को जाँचना चाहते हैं। ज्ञान के लिए, समझने के लिए। दूरी का क्या मतलब है? क्या प्रयोजन है? इस पर हर मानव का ध्यान जाता ही है।
दूरी के मूल में मानव, मानव में समाहित आँख और आँख पर प्रतिबिम्बित विभिन्न वस्तुएं परस्परता के बीच स्थित हैं। यह मूलतः स्थिति की स्वरूप हुई। मानव की आँखों में विभिन्न वस्तुएं प्रतिबिम्बित रहती हैं। मानव की भाषा के अनुसार, कुछ चीजें पास में दिखती हैं। कुछ दूरी में दिखती हैं। इसी आधार पर दूर-दूर में सूरज, चाँद, तारे को देखते हैं। पास-पास में धरती, हवा, जल, पहाड़, पौधे, कीड़े-मकोड़े, पशु पक्षी, मानव को देखते हैं। इस प्रकार से मानव के आँखों पर वस्तुएं सदा-सदा प्रतिबिम्बित रहती ही हैं। हम देख पायें तभी भी रहते हैं, न देख पायें तब भी रहते हैं। इन्हीं तथ्य के आधार पर दूरी और माप की व्याख्या दूसरों को समझाना भी चाहते हैं। स्वयं समझना भी चाहते हैं। दूर में हो, पास में हो, हर इकाई व्यापक वस्तु में ही समायी रहती है। समाये रहते हुए भी पास और दूर हमको दिखाई पड़ते हैं। इस विधि से दूरी का मतलब यह हुआ, सत्ता में डूबी हुई स्थिति का हम अनुभव करते हैं। इस आधार पर दूरी को नापने का तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि हम एक दूसरे के बीच में व्यापक वस्तु को ही नाप के रूप में पाते हैं। यह दो विधि से सम्पन्न हो पाता है। जैसा दूर-दूर में सूरज, चाँद, तारे को देखते हैं। इन्हीं दूरी को धरती पर दो ध्रुवों को अथवा दो शंकुओं को स्थापित कर इन दोनों के मिलन बिन्दु के रूप में सूरज, चाँद, तारे को एक लक्ष्य बना कर इन दोनों के विभिन्न कोणों के आधार पर, इन दोनों के मिलन बिन्दु के आधार पर दूरी का पता लगा देते हैं। इसका नाम है अज्ञात दूरी को ज्ञात करना। दूसरा विधि है, ज्ञात दूरी को ज्ञात करना। ऐसा घटना किसी भी रचना पर ही होना पाया जाता है। रचना ज्ञात रहता है। दूरी अज्ञात रहता है। जैसे धरती में एक किलोमीटर, दो किलोमीटर आदि अनेक प्रकार के हम नाप किया करते हैं। यह धरती स्वयं में एक रचना है। किसी एक शंकु में अथवा ध्रुव बिन्दु से नाप शुरू करते हैं, जिसकी दूरी नापना है, वहाँ तक नाप