इन दोनों मुद्दों पर मानव को सफल होने की आवश्यकता है। इसके लिए सहअस्तित्ववादी नजरिया ही नित्य समाधान है।
मानव संतुष्टि की नजरिये से रूप, गुण, स्वभाव, धर्म रूपी आयामों को स्पष्टता से हृदयंगम करने के उपरान्त ही हर मानव विकास और जागृति के संदर्भ में समाधानात्मक निर्णय संपन्न होना, फलस्वरूप जागृति और विकास की दिशा में सार्थक हो पाना होता है। यही सारांश है।
15. काल
काल की परिभाषा 'क्रिया की अवधि' के रूप में होना स्पष्ट है। क्रिया अपने में निरन्तर संपन्न होती ही रहती है। साथ में कुछ क्रियायें आवर्तित होती रहती है। ऐसे आवर्तन की निरन्तरता बनी रहती है। कभी बंद होती ही नहीं। ऐसी निरन्तर संपन्न होने वाली क्रिया के एक आवर्तन के आधार पर काल को पहचानने का आधार माना गया। धरती का अपने एक घूर्णन गति में, पूरी धरती में दिन रात्रि संपन्न होना पाया जाता है। इसी को एक दिन की संज्ञा दी गयी है। ऐसी दिन रात्रि की क्रिया सदा-सदा से चली आयी है, चलती रहेगी। इस अवधि को 24 भाग, 60 भाग से विभाजित कर घण्टा, मिनट, घटी, पल आदि नामों से पहचानते हैं। इस ढंग से हम समय का विभाजन करते गये, क्रिया को भूल गये। समय के आधार पर हर क्रिया का मूल्यांकन करने के लिए तैयारी कर लिये। समय प्रधान हो गया, वस्तु भूल गये। इस भूल के आधार पर लिये गये सभी निर्णयों से समस्यायें पैदा हुईं। क्रिया व फलन के आधार पर मूल्यांकन होने की आवश्यकता बनी रही।
क्रिया के अवधि रूप में काल गणना होना स्पष्ट है। क्रिया अपने रूप में निरन्तर, शाश्वत है। होना, होते रहना के अर्थ में काल गणना है। सहअस्तित्व अपने आप में नित्य निरन्तर होने के अर्थ में है। नित्य निरंतरता होना स्पष्ट होता है। यही निरंतरता काल संज्ञा में आती है और शाश्वीयता भी काल संज्ञा में आती है। संपूर्ण प्रकृति शाश्वत होने के आधार पर, अविनाशी होने के आधार पर, शाश्वीयता प्रमाणित होती है। क्योंकि संपूर्ण पदार्थवस्था अस्तित्व धर्म के रूप में विद्यमान है, यही पदार्थवस्था विकसित होकर प्राणावस्था में वैभवित होने के आधार पर अस्तित्व सहित पुष्टि धर्मी होना पहचान में आ चुकी है। संपूर्ण जीव में अथवा जीवावस्था अस्तित्व, पुष्टि सहित आशा धर्मी होना समझ में आ चुकी है। इसी क्रम में मानव अस्तित्व, पुष्टि, आशा सहित सुख