मानव कर्म दर्शन

प्राणावस्था, मानव शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में मानव

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अनुकूलता बनाये रखने में ब्रह्माण्डीय किरण विकिरण ही एक मात्र स्रोत है। आज भी यह चीज इस धरती के वातावरण तक प्रस्तुत ही है। किरण जो कुछ भी पहुँच पाता है, वह सब धरती की स्वयं के प्रकाश में अधिक प्रमाणित होते हैं। उसी के साथ-साथ, उष्मा का भी संबंध धरती से बना ही है। धरती एवं धरती में सभी परमाणु प्रभावित है, ऐसे स्थिति में और जो स्रोत हैं, वे विकिरणीय स्रोत ब्रह्माण्डीय क्रियाकलापों के प्रभाव स्वरूप अनेक धरतियों से निष्पन्न या प्रसारित विकिरणीयता का संचार ही रहता है। यह अभी भी बना है। इसी के साथ, यह धरती अनेक प्रजाति के परमाणुओं से समृद्ध होने के आधार पर, इस धरती में भी बहुत सारे विकिरणीय द्रव्य काम कर रहे हैं। इस ढंग से किरण, विकिरण, उष्मा के संयोग से ही सम्पूर्ण यौगिक क्रिया होने की पृष्ठभूमि रही है। यौगिक घटनायें, पानी की घटना से चलकर अम्ल और क्षार रूप में यौगिक घटनायें घटित होने की संभावना की पृष्ठ भूमि को स्वीकारा जा सकता है। क्योंकि अभी भी प्रकारान्तर से अम्ल, क्षार, पानी के संयोग से, विभिन्न अनुपात क्रम में, विभिन्न प्रकार के रसायन द्रव्य तैयार हुआ रहना अपने सम्मुख है। इनके अनुपातों में जो कुछ भी परिवर्तन के लिए सहायक होना है, वह कार्बनिक और अन्य प्रजाति के अणु परमाणुओं की सहायता सदा-सदा से रही। इस प्रकार अम्ल, क्षार और पानी के साथ-साथ उक्त अणु-परमाणु, रासायनिक वस्तु की प्रजातियों की संख्या को बढ़ाने में सहायक होता हुआ पाया जाता है।

इस प्रकार से इस धरती पर रसायन द्रव्य समृद्ध होने की क्रिया घटित हो रही है। इन रसायन द्रव्यों के योग-संयोग से पुष्टि तत्वों, रचना तत्वों का निर्माण, इस घटना के लिये विकिरणीय किरण और उष्मा संयोग के बने रहने से प्रसवित होता हुआ, आज के दिन में वैभवित होता हुआ देखने को मिलता है। पुष्टि तत्व और रचना तत्व के योगफल में प्राण सूत्रों की रचना, प्रस्तुति, कार्यशीलता होता हुआ देखने को मिल रहा है। यही पुष्टि तत्व और रचना तत्व अपने आप में वैभवित होने के रूप में प्राण सूत्र और प्राण सूत्र का रचना यही उष्मा संयोग, विकिरणीय संयोग से कंपन वश, प्राण सूत्रों में रचना विधि सहित श्वसन क्रिया का प्रकाशन होता है। इसके तुरंत बाद ही प्राणकोषाओं का स्वरूप कोषाओं से रचित रचना, ऐसे रचनायें विविध होने के लिए प्राण सूत्रों में रचना विधि की स्वीकृति समझ में आती है। एक प्रकार की रचना अपने में समृद्ध होने के उपरान्त, दूसरे प्रकार की रचना के लिए प्राण सूत्रों में स्वीकृति, फलस्वरूप दूसरे प्रकार की रचनायें इसी क्रम में अन्य रचनायें इस धरती पर प्रमाणित हो चुके हैं। ये सब बीज-वृक्ष विधि सहित है। इसी क्रम में वनस्पतियों का वैभव क्रम, वनस्पतियों की रचना-विरचना होने का क्रम और निरन्तरता यथा स्थिति के रूप में है।