मानव कर्म दर्शन

ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय

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17. ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय

दर्शन (न्याय, धर्म, सत्य), दृष्टा (मानव जीवन), दृश्य (सहअस्तित्व),

ध्यान (जागृति), ध्याता (मानव), ध्येय (भ्रम मुक्ति, जीवन मूल्य, मानव लक्ष्य सहज प्रमाण),

कारण (ज्ञानावस्था), कर्ता (मानव), कार्य (अखण्डता, सार्वभौमता में भागीदारी),

साध्य (दृष्टा पद, जागृति), साधक (मानव), साधन (शरीर व जीवन)

ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय के मुद्दे पर अध्यात्मवादी, अधिदैवीवादी, अधिभौतिकवादी नजरिये से सुदूर विगत में ही सोचना मानव परम्परा में ख्यात रहा अथवा विदित रहा। इन तीनों विधाओं का एकत्रित नामकरण आदर्शवाद रहा। इन तीनों में समानता का बिंदु रहस्य ही है। भौतिकता से अधिक वाला भी एक रहस्य। देवता अपने में एक रहस्य, अध्यात्म अपने आप में रहस्य है। आदर्शवाद का मूल आधार स्थली, गम्यस्थली दोनों रहस्य है। रहस्य के आधार और गम्यस्थली होने के आधार पर ही मतभेदों का होना आवश्यक रहा। इसी के साथ-साथ अनेक विधि से प्रयोग, अभ्यास का भी प्रयास हुआ। जितने भी प्रकार से इन तीनों विधाओं में प्रयास हुए अभ्यास, साधन, योग, ध्यान से लेकर पूजा, पाठ, प्रार्थना तक। इन सभी कृत्यों के फलन के रूप में जो आश्वासन मिला, वह मोक्ष और स्वर्ग, मोक्ष भी एक रहस्य, स्वर्ग भी एक रहस्य रहा और यही गम्यस्थली कहलाता रहा।

आधार भी रहस्य होना इस प्रकार से रहा है। एक रहस्य से ही, रहस्य में ही शून्य, ब्रह्म से ये सभी सृष्टि, स्थिति, लय हुई, अथवा भौतिक क्रियाकलाप से परे किसी वस्तु से सृष्टि, स्थिति लय हुई। इस प्रकार शुरुआत रहस्य से और अंत भी रहस्य से हुआ। अंत, शुभद रहस्य स्वर्ग और मोक्ष से। शुभद इसीलिए कि स्वर्ग और मोक्ष को आनन्द है, रहस्य इसीलिए कि रहस्य में इसका अन्त होने से। इन्हीं तीनों प्रकार की संयुक्त आशय रूपी आदर्शवाद के अनुसार दृश्य, दृष्टा, दर्शन के बारे में ब्रह्मवादियों के अनुसार ब्रह्म ही दृष्टा, ब्रह्म ही अपने संकल्प के अनुसार दृश्य और ब्रह्म ही दर्शन करने वाली दृष्टि है। वैसे ही अधिदैवी वाले भी कहते हैं, जो दस्तावेजों के अनुसार पढ़ने को मिलता है, उसके अनुसार शक्ति विद्या, शिव विद्या, और विष्णु विद्या तीन प्रतिपादित हैं। शक्ति में ही सम्पूर्ण दृश्य, सृष्टि स्थिति लय है। वैसे ही तीनों में ये देवाधीन है। सभी दृश्य इसीलिए है कि दृश्य रूप में देवताओं का संकल्प है, देवता ही दृष्टा हैं, दर्शन करने वाला भी