मानव कर्म दर्शन

दृष्टा, कर्ता, भोक्ता

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संबंध करने में समर्थ नहीं रहे। जब मानव ऐसा सामर्थ्य सम्पन्न हो गए, एक दूसरे समुदाय एक दूसरे के धर्म ग्रन्थों को अध्ययन करने को तैयार हुए। इसमें पता चला कि जिन बातों को हम अपने धर्म ग्रन्थ के अनुसार स्वीकारते हैं, दूसरे धर्म ग्रन्थ उसको स्वीकारते नहीं है। फिर यह ईश्वरवाणी कहाँ है। इस प्रकार से धार्मिक मतभेद उलझता ही गया। सहज रूप में सबको यह स्वीकार होता है कि धर्म ग्रन्थ होना चाहिए साथ में यह भी मानसिकता में स्वयंस्फूर्त कल्पना आती है कि धर्म में कोई विवाद होना नहीं चाहिए, यदि विवाद होता है, तो धर्म ही क्या हुआ! इस प्रकार की तर्क बुद्धि से सोचने वाले मानव भी इस धरती पर हैं ही। इसके बावजूद निर्विवाद धर्म ग्रन्थ क्या होना चाहिए, यह हमें आदर्शवादी विधि से उपलब्ध नहीं हुआ। भौतिकवादियों के लिए धर्म ग्रन्थ की जरूरत ही नहीं है। इस प्रकार हम साधारण मानव प्रताड़ित होते ही रहे, वह अंतर्विरोध से भी, बाह्य संसार के विरोधों में द्रोह-विद्रोह से, शोषण और युद्ध भय से पीड़ित होते ही रहे। इन सब के मूल में ईश्वर कृपा, देव कृपा को ही मानते आए, किसी भी क्षण हमें किसी भी मुद्दे पर राहत मिली, प्रसन्नता मिली, उसे ईश्वर, देवता या गुरुकृपा माना। इस प्रकार हम सामान्य मानव हर्ष-विषाद को झेलते रहे। स्वयं में विश्वास न तो सामान्य कहलाने वाले, न ही विशेष कहलाने वाले के पास रहा। जबकि हर मानव में विश्वास के आधार पर राहत पाने की बात पहचानने में आती रही है। अभी भी वैसा ही है। जिन परस्परताओं में हम विश्वास कर पाते हैं, उसी में हम राहत पाते हैं। यह भले ही क्षण, दिन, वर्ष क्यों न हो। इसे ही हम ईश्वर, देवता, गुरुकृपा मानकर स्वयं को भुलावा देने का कार्य सदा-सदा करते रहते हैं। जबकि मानव अपने कल्पनाशीलता कर्मस्वतंत्रता वश ही इस धरती पर अपने मनाकार को साकार करने में सफल हुआ है। यह स्वयं मानव का उपज नहीं है, तो किसका उपज है। चाहे इसे हम समझें, न समझें, सोचा जाना एक आवश्यक मुद्दा है। इसी के साथ मनःस्वस्थता को प्रमाणित करना ही मानव परम्परा में समाधान है।

ध्यान देने का मुद्दा यहाँ यही है कि जो कुछ भी हमारे सम्मुख प्रतिबिम्बित है, उसके मूल में कोई कर्ता पद है कि नहीं, करने वाला है कि नहीं। अगर इसके मूल में कोई कर्ता नहीं है, तो विश्वकर्ता पद का आरोप गलत हो गया। अगर कर्ता नहीं है, तो भोक्ता पद कैसा होगा। यदि ऐसा नहीं है, तब दृष्टा पद का क्या हुआ। यह सब एक के बाद एक प्रश्न उदय होता रहा है। इन प्रश्नों का उत्तर आदर्शवादी विधि से नहीं मिल पाता है।