मानव संचेतनवादी मनोविज्ञान

| मानवीयतापूर्ण आचरण सहज व अनुसंधान क्यों ?

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1. मानवीयता पूर्ण आचरण सहज व अनुसंधान क्यों ?

सम्पूर्ण मानव में किसी को पहचानने के लिए उसकी मानसिकता ही ध्रुव बिंदु है, चाहे पदार्थवस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था की कोई भी इकाई हो। जैसे अस्तित्व सहित गठित-संगठित आचरणों को पहचानना होता है, इसे विशेषकर परमाणु, अणु और अणु रचित पिण्डों में परीक्षण, निरीक्षण, सर्वेक्षण पूर्वक पहचानना सहज है।

पदार्थवस्था में मृत, पाषाण, मणि, धातु के रूप में वैभव होना पाया जाता है। मिट्टी के आचरण को उर्वरक-संपन्नता और अनुर्वरकता के आधार पर पहचाना जाता है। मिट्टी विद्युतग्राही नहीं होती। पाषाणों को विभिन्न प्रजाति के रूप में उसमें संगठित सम्मिलित अणुओं के आधार पर पहचाना जाता है। ऐसे सभी पाषाण, विभिन्न अनुपातीय मिश्रण रूप में अस्तित्व में होते हैं। इसी के साथ इन में कठोरता भी है, जो भार या दबाव वहन के रूप में पाया जाता है। पाषाण विद्युत-ग्राही नहीं होते।

पदार्थवस्था में मणि समुच्चय तात्विक गठन संगठन सहित पिण्ड के रूप में है। सभी मणियों के गठन में सर्वाधिक एक ही प्रजाति के परमाणुओं से संपन्न अणु का रहना देखा जाता है। इनमें भी कठोरता को नापना और रचना विधि को पहचानना संभव है। मणियों में कुछ मणियां विद्युत ग्राही होती हैं। सर्वाधिक मणियां विद्युत ग्राही नहीं होती। मणियों में सर्वाधिक मणियां किरण-ग्राही होती हैं, कुछ मणियां किरण स्रावी भी होती हैं।

सभी प्रजाति के धातु विद्युत ग्राही होते हैं और इनकी कठोरता के आधार पर इनके आचरणों को पहचाना जाता है। यही इनका प्रधान आचरण है। ऐसी धातुओं में से विकिरणात्मक धातुएं होना भी पहचाना जाता है जिसमें सम्पूर्ण परमाणु अपने परिवेशीय अंशों के गति सहित उष्मा (अग्नि) मध्यांशों में समाहित होता रहता है।