मानव संचेतनवादी मनोविज्ञान

| मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का आधार

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अनिवार्य घटना रहा। यह घटना बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में अधिकांश लोगों को विदित हो चुकी है। इनके सम्मिलित प्रभावों के आधार पर अथवा अलग अलग प्रभाव पर मानव का आचरण सहज निश्चयन होना संभव नहीं हुआ। इसके विपरीत प्रकारान्तर से इसकी चाहत (मानवीयता पूर्ण आचरण की अपेक्षा) बनी ही रही। इस प्रकार मानव का पुनर्अध्ययन होना आवश्यकता बन गई। इस क्रम में रहस्यमय ईश्वरवादी चिंतन के आधार पर मनुष्य सहज जितनी भी परिकल्पनाएं हुईं, वे विविध देश, विविध काल और भौगोलिक परिस्थितियों में मानव जीवन, जीवनी-क्रम और जीवन के कार्यक्रम को अध्ययन गम्य कराने में असफल रही हैं। भक्ति व विरक्ति विधि से भी सार्वभौम रूप में लोकव्यापीकरण प्रभावित नहीं हो पाया। इसी प्रकार अस्थिरता, अनिश्चयता मूलक वस्तु केन्द्रित चिंतन ज्ञान के आधार पर मानव-जीवन, जीवनी क्रम, जीवन के निश्चित कार्यक्रम का अध्ययन नहीं हुआ। इसलिए निश्चयात्मक, मानवीयता पूर्ण आचरण की परिकल्पना, अध्ययन और प्रमाण तथा इसे व्यावहारिक प्रयोजन के साथ बोधगम्य करा देना ही “मानव संचेतना वादी मनोविज्ञान” का अभिप्रेत मुद्दा है।

2. मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का आधार

मानवीयता पूर्ण आचरण को पहचानने का आधार, अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान है। यह चिंतन अस्तित्व में, अनुभव मूलक विधि से सहज सुलभ हुआ है। सहज का तात्पर्य, प्रत्येक मनुष्य में, से, के लिए अध्ययन मूलक प्रणाली से बोधगम्य होने से और अनुभव मूलक प्रणाली सहित अभिव्यक्त होने से है। सुलभ का तात्पर्य, इसके लोक व्यापीकरण होने की संभावना, आवश्यकता और प्रयोजन से है। अस्तित्व ही नित्य वर्तमान है। इस रूप में, सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में सह-अस्तित्व होना प्रतिपादित एवं व्याख्यायित हुआ है। नित्य वर्तमान सहज सह-अस्तित्व में ही सम्पूर्ण भाव, क्रिया, स्थिति, गति और अस्तित्व सहज प्रयोजन (पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञानावस्था) निरंतर प्रमाण रूप में देखना मानव में, से, के लिए सहज है। जिसमें से मानव ज्ञानावस्था में,