मानव संचेतनवादी मनोविज्ञान

| मानव तथा पूरकता

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कार्यकलापों को संपन्न करती है, तब परम संगीत, आनंद के नाम से ख्यात होता है। आत्मा में, अस्तित्व के अनुरूप कार्य होना सहज है। यह सहजता, मानवीयता पूर्ण प्रामाणिकता सम्पन्न परम्परा की महिमा से सर्व सुलभ होता है। दूसरा, अनुसंधान विधि से भी संपन्न होता है। इस प्रकार बलों में संगीतीकरण प्रणाली से मनः स्वस्थता का प्रमाण और शक्तियों में संगीतीकरण प्रणाली से नैसर्गिक संतुलन, अखंड समाज में संतुलन, सार्वभौम व्यवस्था में संतुलन, मानवीय शिक्षा-संस्कार, स्वास्थ्य-संयम सहित न्याय-सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय-सुलभता सम्पन्न संस्कृति, सभ्यता, विधि व्यवस्था में संतुलन संभव है। इसे प्रमाणित करने के क्रम में ही “मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान” की सहज प्रस्तुति है।

3. “मानव तथा पूरकता”

अस्तित्व में मानव एक अविभाज्य इकाई है। मानव का स्वरूप शरीर और जीवन के सह-अस्तित्व में प्रमाणित है - जिसमें से जीवन नित्य है क्योंकि जीवन “परिणाम के अमरत्व” सहज फलन चैतन्य पद एवं ज्ञानावस्था में वैभवित है। ऐसा जीवन शरीर को जीवन्त रखते हुए, जागृत जीवन सहज आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता के आधार पर संचालित होना पाया जाता है। शरीर संवेदना के क्रिया-कलाप, जीवंतता के आधार पर ही पांचों ज्ञानेन्द्रियों का कार्य संपादित हो पाता है। कर्मेन्द्रियों का क्रियाकलाप, जीवन्तता स्पष्ट न रहते हुए भी कुछ क्षण, कुछ दिन, कुछ मास और वर्ष तक भी पराधीनता विधि से सप्राणित रह सकता है अर्थात् श्वांस और हृदय क्रिया चल सकती है। इस अवस्था में मनुष्य सहज परिभाषा का कार्यकलाप नहीं हो पाता, इसका प्रमाण कई लोग देख चुके हैं। अस्तु, शरीर सप्राणित रहना भी आवश्यक है। यह तथ्य ऊपर स्पष्ट किए गए विश्लेषण से निश्चित होता है। जीवन्तता, जीवन का ऐश्वर्य है। श्वास लेने-छोड़ने की प्रक्रिया प्राण कोशाओं से रचित शरीर रचना की महिमा है।

इस प्रकार जीवन और शरीर के संयुक्त रूप मानव-परम्परा की