मानव संचेतनवादी मनोविज्ञान

| अनुसंधान और लोकव्यापीकरण

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निर्वाह ही, सम्बन्धों को पहचानने का प्रमाण है। मूल्य, मूलतः जीवन सहज बल की ही अभिव्यक्ति, संप्रेषणा है। इसमें अनुभव बल ही प्रधान कार्य, क्रिया वस्तु है। जागृति पूर्णता के रूप में अनुभव, व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। यही नित्य विश्वास के रूप में ही व्यक्त होता है। इसका प्रयोजन और कार्य रूप वर्तमान में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी ही है। व्यवस्था यह है यथा समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व मानव सहज अपेक्षा है।

सर्वतोमुखी समाधान पूर्वक ही सदा-सदा सुखी होना पाया जाता है, विश्वास सहज कार्य व्यवहार रूप में सम्बन्धों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह मूल्यांकन उभयतृप्ति व संतुलन ही है। विश्वास केवल सत्य में, से, के लिए होता है। अस्तित्व ही परम सत्य है। जीवन ज्ञान, परम सत्य है। मानवीयता पूर्ण आचरण का, परम सत्य होना, पाया जाता है। इसे चरितार्थ रूप देने की अभिलाषा से ही, मानव-संचेतना को पहचाना गया है। अस्तित्व में मानव का वैभव अथवा स्वराज्य को, स्वयं के वैभव को प्रमाणित करने के लिए एक अध्ययन की आवश्यकता को अनुभव किया गया है।

मूल्यों का प्रयोजन, सम्बन्धों के अनुरूप, नाम दिया गया है। इसे स्थापित मूल्यों के रूप में नौ नामों से, संबोधित किया गया है। सभी मूल्य, व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी तथा प्रमाणिकता सहज (के) रूप में ही, प्रमाणित है - जैसे कृतज्ञता, गौरव, श्रद्धा, प्रेम, विश्वास, वात्सल्य, ममता, सम्मान, स्नेह है। सम्बन्ध सहजता, व्यवस्था सूत्र में और व्यवस्था सूत्र सह-अस्तित्व में, सह-अस्तित्व, अस्तित्व में वैभवित रहना पाया जाता है। “सम्बन्धों के अनुरूप” - का तात्पर्य पूर्णता के अर्थ में अनुबंध से है और पूर्णता का अर्थ जागृति पूर्णता से है।

4. अनुसंधान और लोकव्यापीकरण

मानव सहज रूप में, निरंतर अनुसंधान शोध और प्रयास करते आया। मानव परम्परा में सुदूर विगत से दो अनुसंधान प्रधान हैं।