वृत्ति
जीवन विद्या क्रम में अर्थात् जीवन ही, जीवन को, जीवन से, जीवन के लिये समझने के क्रम में जीवन सहज प्रक्रियाओं को जानना-मानना, तदनुसार पहचानना, निर्वाह करना एक जागृत जीवन सहज प्रक्रिया है। मन में 64 आचरण हैं। जिसमें से परावर्तन में 32 तथा प्रत्यावर्तन में 32 हैं। इस रूप में कुल 64 आचरणों को, चयन-आस्वादन सहज क्रियाओं के आधार पर स्पष्ट किया जा चुका है। एक ही निबन्ध में मन की दस क्रियाओं को, बीस आचरणों के रूप में स्पष्ट किया जा चुका है। इसमें मीठा, खट्टा आदि रुचियों के आधार पर, आवश्यकतानुसार, प्रत्येक व्यक्ति, हर आयाम में स्वनिरीक्षण पूर्वक प्रमाणित करता है। इस विधि से इसे स्पष्ट करने की प्रक्रिया को सम्पन्न किया गया है। मन के 64 आचरणों को प्रत्येक मनुष्य अपने में निरीक्षण पूर्वक परीक्षण करता है, यह संभव हो गया है। इसका प्रमाण हम स्वयं जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण सम्पन्न प्रत्येक नर-नारी होना है। ये सभी आचरण, मानव सहज, स्वीकृत आचरण हैं। मन, जीवन की एक अविभाज्य क्रिया है (अथवा अपरिहार्य क्रिया है)। इसी प्रकार जीवन सहज सभी क्रियाओं के प्रत्येक मनुष्य जीवन में प्रमाणित होने की संभावनाएं समीचीन हैं।
इसीलिए मानवीयता पूर्ण आचरण, अस्तित्व-दर्शन और जीवन-ज्ञान सहज अविभाज्य अभिव्यक्ति क्रम में कही गई। जीवन में नित्य कार्यरत जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने, स्वीकार करने की क्रिया, जिससे हर क्रिया-प्रक्रिया को लक्ष्य के अर्थ में निर्धारित करने और फल परिणाम के प्रति जागृत रहने की क्रिया वृत्ति में, तुलन और विश्लेषण कार्य रूप में संपादित होता हुआ, देखने को मिलता है। देखने का तात्पर्य समझना है। सम्पूर्ण समझदारी ग्राहिता पूर्वक (अर्थात् समझने के क्रिया-कलापों के आधार पर) ही संप्रेषणा, अभिव्यक्ति, प्रकाशन सहज परावर्तन क्रियाएं सम्पन्न होती ही रहती हैं। ऐसी जागृत सम्पूर्ण क्रियाएं, मनुष्य में ही प्रमाणित