मानव संचेतनवादी मनोविज्ञान

5.21 वृत्ति में होने वाले 36 आचरण

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होना पाई जाती हैं। इसी आधार पर वृत्ति में होने वाली विश्लेषण और तुलन क्रियाकलापों को 18 प्रकार से देखा गया है। जिसका परावर्तन प्रत्यावर्तन विधि से 36 आचरण होते हैं। इन क्रिया-कलापों को आगे, जीवन में जो अविभाज्य हैं, स्पष्ट किया गया है।

वृत्ति में होने वाले 36 आचरण

1. विद्या - 2. प्रज्ञा

परिभाषा : विद्या :- (1) जो जैसा है उसे वैसा ही विधिवत जानने, मानने, स्वीकार करने की क्रिया।

प्रज्ञा :- परिष्कृति पूर्ण संचेतना। वस्तुगत सत्य, वस्तु स्थिति सत्य के प्रति अवधारणा एवं अनुभव मूलक गति और स्थिति सत्य में बोध एवं अनुभव मूलक गति है।

मध्यस्थ दर्शन, मनुष्य और अस्तित्व को वर्तमान में प्रमाणित करने की चिंतन धारा है। यहां चिंतन का तात्पर्य साक्षात्कार पूर्वक प्रयोजन के अर्थ में प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने से है। इस क्रम में, अस्तित्व और मानव ही, अध्ययन की वस्तु है। अस्तित्व, सत्ता (साम्य ऊर्जा) में सम्पृक्त प्रकृति के रूप में वर्तमान है। फलस्वरूप विकास क्रम में और रचना क्रम में मनुष्य और प्रकृति सहज ही अध्ययन गम्य हुए हैं। जिसमें से मानव के अध्ययन में, जीवन और शरीर का स्पष्ट रूप, कार्य व्यवहार, व्यवस्था व प्रयोजन समझ में आता है। यह अध्ययन गम्य हुआ है। जिसमें से जीवन ही विद्या का केन्द्र बिंदु है। जिसमें विद्या का तात्पर्य समझदारी से है। जीवन ज्ञान, जीवन जागृतिपूर्वक, परिपूर्ण होता है। जीवन जागृति, जानने-मानने के क्रम में सहज रूप में प्रमाणित होती है। जीवन प्रकाश में ही अस्तित्व दर्शन, सहज संभव है। जागृत जीवन प्रकाश ही न्याय, धर्म, सत्य दृष्टि के रूप में, क्रियाशील रहता है। इस प्रकार सह-अस्तित्व ही सम्पूर्ण विद्या का स्वरूप हुआ। अस्तित्व में मानव अविभाज्य है। हर मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में वर्तमान है। मानव समग्र अस्तित्व को, जीवन को, शरीर को जानने, मानने पहचानने, निर्वाह करने के रूप में अभिव्यक्त होने वाला है।