परिचयात्मक-test1

प्रस्तावना · Text edition

Pages
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प्रारंभिक पाठमाला

अभित्व मूलक मानव केभित चिंतन

सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअभित्ववाद)

- ए. नागराज (प्रणेता एवं लेखक)

मध्यस्थ दर्शन सहज ‘प्रवेर्’ पुस्तक

1.जीवन ववद्या एक परिचय (प्रकावित पुस्तक)

2.सहअस्स्तत्ववाद एक परिचय (संकलन) {PDF}

3.प्रारंभिक पाठमाला {PDF}

4.सत्संग (2005 प्रवतलेखन) {PDF}

5.मध्यस्थ दिशन एक परिचय (1999 प्रवतलेखन) {PDF}

6.सहअस्स्तत्ववादी ववज्ञान (1999 प्रवतलेखन) {PDF}

7.मूल तत्व अवलोकन (संकलन) {PDF}

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प्रकार्क :

जीवन ववद्या प्रकािन, वदव्यपथ संस्थान

अमिकंटक, वजला - अनूपपुि (म.प्र.), भाित, 484886

www.divya-path.org

प्रणेता एवं लेखक :

ए. नागिाज

सवाशविकाि वदव्यपथ संस्थान के पास सुिवित

संस्करण: e-book PDF: 14 जनविी 2026

प्रामाविक वेबसाइट : www.madhyasth.org

प्रकावित पुस्तक प्रावि : purchase.madhyasth.org; books@divya-path.org

सदुपयोग नीतत:

यह प्रकािन ‘सवशिुभ’ के अथश में है औि इसका कोई व्यापारिक उद्देश्य नहीं है। इसका उपयोग एवं नकल, वनजी अध्ययन के वलए उपलब्ि है। इसके अलावा वकसी भी अथश में प्रयोग (नकल, मुद्रि, आवद) किने के वलए ‘वदव्यपथ संस्थान’, अमिकंटक, वजला अनुपपुि (म.प्र.) भाित - 484886 से पूवश में वलस्खत अनुमवत लेना अवनवायश है। यह अपेवित है की इन अविाििाओं को दूसिी जगह प्रयोग किते समय इस ग्रंथ का पूिश उद्धिि (संदभश) वदया जाएगा। कृपया दिशन की पववत्रता बनाये िखें।

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इस संकलन के बारे

यह पुस्तक/संकलन श्रद्धेय नागिाजजी के अप्रकावित लेखों से है।

पाठकों को ध्यानाकर्शि है वक पढ़ते समय अथश पि संदेह होने पि प्रकावित ग्रंथों को माना जाए।

मूल पाण्डुवलवप प्रवत का वलंक

भिम्मेदाररयााँ :

टाइतपंग एवं जांच: वंदना वसंघल, संदीप भावटया,गुंजन पिमाि, अमिेि, िचना सुिीि

स्कैभ ंग एवं वगीकरण: श्रीिाम निवसम्हन

सुधार संपर्क: books@divya-path.org

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अनुक्रमणिका

प्रस्तावना | 7

1.िाष्ट्रीय चरित्र: ववगत का अवलोकन तथा ववकल्प की आवश्यकता | 7

2.प्राचीन ज्ञान-ववज्ञान मध्यस्थ दिशन, सह-अस्स्तत्ववाद व जीवन ववद्या | 13

3.सही बात को समझना | 16

मानव | 20

1.मानव जीवन एवं जीवनी-क्रम | 20

2.मानव में सत्य की खोज क्यों? | 24

3.बुवद्धजीवी मानव के प्रवत प्राथशना | 26

4.परिवाि मानव: एक आवश्यकता (क्र.१) | 29

5.परिवाि मानव: एक आवश्यकता (क्र.२) | 32

मध्यस्थ दर्शन | 35

1.मध्यस्थ दिशन (क्र.१) | 35

2.मध्यस्थ दिशन (क्र.२) | 38

3.मध्यस्थ दिशन (क्र.३) | 40

4.मध्यस्थ दिशन (क्र. ४) | 43

5.मध्यस्थ दिशन (क्र. ५) | 44

6.मध्यस्थ दिशन (क्र. ६) | 49

7.मध्यस्थ दिशन (क्र. ७): ‘चैतन्य प्रकृवत का िहस्य उद्घाटन’ | 52

7.मध्यस्थ दिशन (क्र. ७) : दिशन की महत्ता | 56

जीवन तवद्या | 62

1.जीवन ववद्या (क्र. १) | 62

2.जीवन ववद्या (क्र. २) | 64

3.जीवन ववद्या (क्र. ३) | 67

4.जीवन ववद्या (क्र. ४) | 73

5.जीवन ववद्या (क्र. ५) | 74

6

6.जीवन ववद्या (क्र. ६) | 77

7.जीवन ववद्या (क्र. ७) | 81

8.जीवन ववद्या (क्र. ८) | 86

9.जीवन ववद्या (क्र. ९) | 90

10.जीवन ववद्या (क्र. १०) | 91

11.जीवन ववद्या (क्र. ११) | 92

12.जीवन ववद्या (क्र. १२) | 95

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प्रस्तावना

1. राष्ट्रीय चररत्र: तवगत का अवलोकन तथा तवकल्प की आवश्यकता

भवगत का अवलोक

1.सुदूि ववगत से आज पयशन्त वववभन्न संस्कृवतयां एवं सामावजक व्यवस्थाएँ अपनी-अपनी भौगोवलक परिस्स्थवतयों के आिाि पि वनवमशत हुई औि मौवलक रुप में भौवतक एवं अविभौवतक वचंतन पि आिारित िही है। इसी वचंतन के आिाि पि उनकी िावमशक, आवथशक एवं िाजनैवतक प्रिावलयाँ वनवमशत एवं ववकवसत हुई। वतशमान में अपने समस्त सािनों से सम्पन्न होकि ये संस्कृवतयाँ अथवा सामावजक व्यवस्थाएँ पिस्पि सम्पकक में आई। परििाम स्वरुप प्रत्येक संस्कृवत एवं व्यवस्था की अपनी श्रेष्ठता एवं उपादेयता के प्रवतस्थापन-क्रम में पािस्परिक संघर्श पूवशक दलन, दमन एवं िोर्ि की कूटनीवत को वतशमान िाजनीवत का रुप समझा जा िहा है। यही अंतर्द्वंर्द्व अथवा अंतववशिोि भयंकि उथल-पुथल एवं तृतीय ववश्वयुद्ध की संभावनाओं से गवभशत है। 2. युद्ध अथवा युद्ध की मानवसकता मानव ववकास के वलये कभी भी सहायक वसद्ध नहीं हुई है। इससे जन- समूह भयाक्रांत होकि व्यवि केस्न्द्रत अथवा व्यविपिक ववचािों में सीवमत साथ ही सामावजकता के वचंतन से ववमुख होता गया जबवक सामावजकता ही वनभशयता अथवा वनभशयता ही सामावजकता है। 3. अतीत में िमशप्रिान एवं अथशप्रिान िाजनैवतक व्यवस्थाओं के प्रयोग अपनाये गये थे। िमशप्रिान िाजनीवत के मूल में पाप-पुण्य तथा स्वगश-निक के भय एवं प्रलोभन मुख्य तत्व िहे हैं। इसी प्रकाि अथशप्रिान िाजनीवत पूंजीवादी एवं साम्यवादी व्यवस्था प्रिाली से प्रभाविील हुई। इन दोनों के लक्ष्य वगश एवं अवतभोग अथवा बहुभोग ही िहे हैं। 4. इस प्रकाि अतीत के भय औि प्रलोभन के िहस्य पि आिारित िमश प्रिान व्यवस्थायें न तो मानव को वनर्भ्शम व वनर्भ्ांत बना सकी औि न उसे समृवद्ध, समािान एवं सुख की वनिन्तिता ही प्रदान कि सकी। अवतभोग एवं बहुभोग वाली अथश प्रिान व्यवस्थायें भी मानव को जीवन मूल्य एवं समाज मूल्य से समृवद्ध नहीं बना सकी । फलतः सिंकता, भय, वनिािा एवं कुण्ठा की अवभवृवद्ध हुई। 5. भौवतकवादी व्यवस्था की असफलता क) अनेक सम्प्रदाय, वगश, जावत, मत आवद के आिाि पि स्थावपत समझौतावादी वगश भावना से सम्बद्ध

समाज कहलाने वाली इकाईयां मानव के वलए समािान, समृवद्ध, अभय एवं सहअस्स्तत्वपूिश सावशभौवमक सामावजकता िाष्ट्रीयता को ववकवसत किने में समथश नहीं िहीं। फलस्वरुप प्रत्येक देि असमािान, संिकता, भय एवं सह अस्स्तत्व ववहीनतावि वदग्भ्र्भ्वमत होकि सम्पूिश मानव के ववनाि हेतु िस्त्र भंडाि या वनमाशि किने के वलये हठ एवं होड़ सवहत प्रयास ित है। वतशमान में प्रिानतः युद्ध वनपुितापूिश युद्ध सामवग्रयों के वनमाशि एवं संग्रह किने में जो देि समृद्ध है उसी देि को मनुष्य ने ववकवसत देि कहा। क्या स्वववध्वंस िमता ववकास की कसौटी मानी जा सकती है? क्या यह क्रूिता का द्योतक नहीं है? क्या क्रूिता, अखंड सामावजकता िाष्ट्रीयता हो सकती है? क्या यह दानवीयता नहीं है? क्या दानवीयता ही ववकास है? यह सब प्रश्न अपने आप उभि कि आते हैं। साथ यह बात भी स्मिि में आती है वक क्या िाष्ट्र व िाज्य के ववकास एवं ववकासिीलता की सम्पवत्त, सामग्री, उद्देश्य एवं आदिश क्रूिता हो सकती है? यवद हां तब उसके साथ औि दो तत्व हीनता एवं दीनता अवश्यंभावी हैं हीनता का तात्पयश ववश्वासघात से एवं दीनता का तात्पयश अभाव एवं अिमता से है। यवद हीनता, दीनता एवं क्रूिता िाज्य एवं िाष्ट्र की मानवसकता होती तो क्या सामावजक व्यवस्था एवं उसके कायशक्रम कभी सफल हो सकते हैं? इन तमाम प्रश्नों के उत्ति में प्रत्येक सामान्य व्यवि का उत्ति नकािात्मक ही होगा। ऐसी स्स्थवत में सामावजकता का क्या आिाि िहेगा? मानव की मानवसकता ही उसके वनमाशि का मूल आिाि होती है। यवद वकसी मानव या िाष्ट्र की मानवसकता के मूल में छल, कपट, दम्भ, पाखंड, द्रोह-ववद्रोह, वि- ववध्वंस अथवा स्वयं के वलये अवत भोग या बहुभोग िहा हो तो उस िाष्ट्र या सनाज का अंवतम परििाम स्वयं या अन्य के वलये क्लेि श्ृंखला के अलावा औि क्या हो सकता है? यह सत्र भौवतकवादी अथशप्रिान वचन्तन एवं व्यवस्था का अब तक का परििाम िहा है। ख) भौवतकवादी अथवा भोग-पिक वचन्तन प्रकृवत के ववकास क्रम को मानते हुए गठनपूिशता, वकया पूिशता

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एवं आचििपूिशता अथाशत चैतन्य प्रकृवत के सम्यक अध्ययन की मानवसकता वनवमशत किने में समथश नहीं िहा है। वजसके फलस्वरुप समाज मूल्य एवं जीवन मूल्य का समुवचत अध्ययन नहीं हो पाया है। इसी सत्यतावि ननुष्य को जड़ प्रकृवत अथाशत् िासायवनक अथवा भौवतक परििाम एवं परिवतशन की सीमा में ववश्लेर्ि किते हुए यांवत्रक जीवन के वलये बाध्य वकया है। मनुष्य का स्वभाव से ही संवेदन एवं संज्ञानिील होने के कािि यंत्रवत जीवन तक सीवमत िह सकना संभव नहीं हो िहा है औि उस घुटन से बाहि वनकलने के वलये छटपटा िहा है। साथ ही स्वस्थ वदिा व मागश के वलये प्रतीिाित है। ग) अवि भौवतकवादी (िमशप्रिान) व्यवस्था की असफलता-अविभौवतकवादी िमश प्रिान वचन्तन व

व्यवस्था ने िहस्य पि आिारित पाप-पुण्य, स्वगश-निक एवं मोिवादी प्रलोभन या भय की मानवसकता को वनवमशत वकया। साथ ही मोि या वनवृवत्तवादी मानवसकता के अवतरिि स्वगश व पुण्य के फल में भोग प्रावि का प्रलोभन अथवा उसके ववनिीत में भोग के अभाव होने के साथ प्रताड़न-भय की मानवसकता को वनवमशत वकया। इतना ही न होकि अथाशत् उच्ांग स्स्थवतयाँ अथाशत मोि कैवल्य, सहज-अवस्था एवं सािात्काि के वलये भी िहस्य का आविि बना ही िहा। इसी िहस्यमयता-वि अविभौवतक या िमश प्रिान व्यवस्था के अन्तगशत वनवमशत मानवसकता के अन्तगशत आने वाले मानव समाज में आत्म वनभशिता के स्थान पि एक सवशिविमान िहस्यमय इकाई पि पिावश्रत िहने की मानवसकता को तैयाि वकया। इसी पिाियी भावना या मानवसकता ने मानव को पिम्पिा का दास बनाया एवं इसके कािि पुरुर्ाथश तथा स्वअस्स्तत्व के प्रवत गौिवपूवशक साहवसकता ववकवसत नहीं होने पाई। इस प्रकाि अविभौवतकवादी या िमशप्रिान वचन्तन प्रकृवत के ववकासक्रम में मानव जीवन, जीवनी क्रम एवं जीवन के कायशक्रम को ववश्लेर्ि पूवशक ववकवसत किने में समथश नहीं िहा है।

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घ) ववकल्प की आवश्यकता ५-IV इन ऐवतहावसक प्रयोगों एवं उनके परििामों से स्पष्ट् होता है वक िमश एवं

अथशपिक वचन्तनों पि आिारित व्यवस्थायें मानव समाज पि प्रयोग के र्द्वािा व्यथश वसद्ध हो चुकी हैं। अस्तु ववकल्प के रूप में एक स्वस्थ सामावजक व्यवस्था की अवनवायशता की अनुभूवत वतशमान ववश्व-समाज को हो िही है वजसमें समािान, स वद्ध, अभय एवं सह-अस्स्तत्व सवश सुलभ हो सके। ऐसी व्यवस्था मानवीयता पूिश सह अस्स्तत्ववादी वचंतन पि आिारित होगी वजसके वलये जड़ व चैतन्य प्रकृवत की वक्रयािीलता का अध्ययन एक अवनवायश तथ्य है। क्योंवक मनुष्य जड़ व चैतन्य का संयुि साकाि रुप है। 6. चैतन्य प्रकृवत की वविेर्ता : क) चैतन्य पद, प्रकृवत के ववकासक्रम में पाया जाने वाले एक तथ्य है। जड़ प्रकृवत का पिमािु ही ववकास

पूवशक अथवा गठनपूिशता पूवशक चैतन्य पद अथवा जीवन पद को पाता है। फलतः अमित्व वसद्ध होता है। साथ ही अिय िवि सम्पन्न होता है। इस प्रकाि जीवनता एकअनुस्यूत प्रवक्रया वसद्ध होती है। इससे स्पष्ट् होता है वक जीवन वनत्य जन्म-मृत्यु घटना मात्र है। इसी चैतन्य जीवन के क्रम में जीवन का समस्त कायशक्रम समाया है। जीवन एवं जीवन के कायश-क्रम के ज्ञापन, प्रकािन, व्यवहाि एवं संस्काि की प्रवक्रया ही संस्कृवत या सभ्यता है। अस्स्तत्वपूवशक जन्म र्द्वािा जीवन ही जीवात्मा एवं ज्ञानात्मा के पद या रुप में प्रकावित है। जीवन की वनिन्तिता जन्म घटना का मूल कािि है। जीवन के अभाव में जन्म का होना नहीं पाया जाता है। जीवन पद प्रवतष्ठा पिमािु में गठन पूिशता से ववकवसत होती है। गठनपूिशता का तात्पयश पिमािु में समाने योग्भ्य सभी अंिो के समा जाने से है यह घटना पिमािु के स्वभाव गवत तथा वाताविि के दबाव व देय के योगफल में होती है। प्रत्येक इकाई के वलये स्वभाव गवत प्रवतष्ठा में ही उसके ववकास की संभावना अत्यंत, सवन्नवहत या उवदत होती है। इसी क्रवमक ववकास में जड़ चैतन्यात्मक प्रकृवत प्रकट है। जड़ प्रकृवत के पिमािु में प्रस्थापन, ववस्थापन के साथ रुप औि गुिो में परिवतशन होता है वजसका परिमावित होना पाया जाता है। ख) इससे स्पष्ट् होता है वक जड़ प्रकृवत में मात्रात्मक परिवतशन के साथ गुिात्मक परिवतशन होता है जबवक

चैतन्य प्रकृवत में केवल गुिात्मक परिवतशन का क्रम पाया जाता है वजसका परिमाि नहीं होता है जैसे- आिा, ववचाि एवं संकल्प में परिवतशन के साथ कोई मात्रात्मक परिवतशन नहीं होता है जो बच्ों से बड़ों तक में देखा जा सकता है। र्भ्म का ज्ञान होने एवं उसका सुिाि किने का ज्ञान व अविकाि गुिात्मक परिवतशन है जो मानव के वलये एक सहज संभावना है। इसे मनुष्य के वलये सहज, सुलभ व साथशक बनाने की वदिा में मनुष्य अध्ययन, अध्यापन, प्रयोग, संयोजन, योजन, संिान एवं अनुसंिान कायश में ित है। इस क्रम में मनुष्य अस्स्तत्व प्रवतष्ठा से व्यवहाि प्रवतष्ठा तक ववविवत अध्ययन किना चाहता है। ववविवत अध्ययन का तात्पयश वस्तु स्स्थवत, वस्तुगत एवं स्स्थत सत्य में वनर्भ्शमता के रूप में स्पष्ट् है। ग) वस्तुस्स्थवत सत्य - देि, काल एव वदिा के ज्ञान में चरिताथश होता है। घ) वस्तुगत सत्य - रूप, गुि, स्वभाव एवं िमश के ज्ञान में होता है। ङ) स्स्थवत सत्य सत्ता - में सम्पृि प्रकृवत (अस्स्तत्व समग्र) के ज्ञान में होता है।

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च) चैतन्य इकाई में आिा, ववचाि, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूवत का प्रकािन ििीि के र्द्वािा होता है वजसे

प्रत्येक जीव ििीि के र्द्वािा आिा औि मनुष्य ििीि के माध्यम से आिा, ववचाि, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूवत को देखा जाता है। चैतन्य वक्रया अथाशत जीवन अिय िवि सम्पन्न होने के कािि उपभोग से अविक उत्पादन किने में सिम है। इसी सिमतावि चैतन्य वक्रया या जीवन में आिा, ववचाि इच्छा, संकल्प एवं अनुभव िवियों का प्रकािन वकतना भी किें उससे चैतन्य वक्रया या जीवन में कोई छिि नहीं होता है। यह उसकी अिय िवि का प्रिान लिि है। चैतन्य इकाई या जीवन की अिय िवि सम्पन्नता के कािि जीवनीयता प्रवतवष्ठत या प्रकावित होती है। यही संवेदनिीलता तथा संज्ञानीयता है। इसी प्रवतष्ठावि वातावििस्थ वक्रया व सत्यता के संकेत ग्रहि व प्रसािि की वक्रया होती है। इस प्रकाि चैतन्य वक्रया ही जीवन है औि अियता ही इसकी प्रथान वविेर्ता है। छ) उपिोि वविेर्तावि चैतन्य इकाई में गुिात्मक परिवतशन के साथ मात्रात्मक परिवतशन नहीं होता है।

चैतन्य इकाई में गुिात्मक परिवतशन के साथ यवद मात्रात्मक परिवतशन होता तब प्रत्येक आिा, ववचाि, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूवत के साथ मात्रात्मक एवं रूपात्मक परिवतशन भी होता जबवक ऐसा नहीं होता है। इसके ववपिीत ववचािों के अनुरूप वबना वकसी रूपात्मक या मात्रात्मक परिवतशन के ििीि का संचालन होता िहता है। चैतन्य के सहयोग से जड़ ििीि वजतनी िवि ग्रहि किता है उससे कहीं अविक िवि को बवहगशत किता है। चैतन्य वक्रया अथवा जीवन के अवतरिि स्थूल ििीि िासायवनक एवं भौवतक संिचना है। इसके सम्पूिश वक्रयाकलाप यांवत्रक हैं। यांवत्रकता में वजतनी िवि ग्रहि होती है उससे कम का प्रकिन होता है। इन तथ्यों से यह स्पष्ट् हो जाता है वक मनुष्य जड़ ििीि औि चैतन्य वक्रया (जीवन) का संयुि साकाि रुप है। मानव के संस्काि मात्र का जीवनगत होना अथाशत आिा, ववचाि, इच्छा, एवं संकल्प गत होना उसी के आनुर्ंवगक क्रास्न्तकारिता (गुिात्मक ववकास) एवं जनवावदता का होना एक वस्तुगत सत्य के रुप में पाया जाता है वजसके आिाि पि ववकास एवं ह्रास स्पष्ट् होता है। मनुष्य का प्रकािन अमानवीयता, मानवीयता औि अवतमानवीयता वादी कायश, व्यवहाि, व्यवसाय, अध्ययन एवं व्यवस्था संबंिी प्रवक्रयाओं के रुप में होता है। मनुष्य की स्वभाव गवत मानवीय होने के कािि उसकी तुलना में ह्रास एवं ववकास का वनिशय हो पाता है। ज) वनयवतक्रम में ववकास का अभाव नहीं है। यह प्रकृवत में ववविवता के रुप में दृष्ट्व्य है। यह ववकास

वववविता इस पृथ्वी पि चाि स्स्थवतयों में अथाशत पदाथाशवस्था, प्रािावस्था, जीवावस्था एवं ज्ञानावस्था में परिलवित होती है। यही वैववध्यता ववकास क्रम प्रवक्रया एवं व्यवस्था को स्पष्ट् किती है। इन सब का अध्ययन ही दािशवनकता है। 7. 1. दािशवनकता मनुष्य की संवेदनिीलता एवं संज्ञानीयता का अध्ययन एवं प्रकािन है। यह मनुष्य की अववभाज्य िमता है। दिशनिता अस्स्तत्व में, अस्स्तत्व से एवं अस्स्तत्व के वलये समािान एवं आनन्द के अथश में चरिताथश होती है। अस्स्तत्व समग्र सत्ता में सम्पृि प्रकृवत है। प्रकृवत का तात्पयश रुपात्मक अस्स्तत्व से है। यही अनेक रुप में स्पष्ट् है। अनेकरूपता अथवा वैववध्यता मूलतः अध्ययन का ववर्य है।

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अरुपात्मक अस्स्तत्व समान रुप में अथाशत सवशत्र एक सा होना पाया जाता है। सम्पूिश गवत एवं मात्रा रुपात्मक अस्स्तत्व की सीमा में दृष्ट्व्य है। सम्पूिश गवत व मात्रा अरुपात्मक अस्स्तत्व में समावहत है। प्रकृवत की वृहद से वृहद एवं सूक्ष्म से सूक्ष्म इकाइयाँ गवत व मात्रा िवहत अस्स्तत्व में वघिी हुई हैं जो मध्यस्थ सत्ता, िून्य, ज्ञान, पूिश एवं पिमात्मा आवद संज्ञा से अवभवहत है। मूलतः रुपात्मक एवं अरुपात्मक अस्स्तत्व ही अस्स्तत्व समग्र है। 2. अस्स्तत्व स्वयं में कोई संख्या नहीं है। यह केवल अनंत एवं व्यापक है। कािि गुि एवं गवित से मनुष्य के र्द्वािा प्रत्येक स्स्थवत वनविशत होती है जबवक अस्स्तत्व के संबंि में उसकी ववस्ताि व्यावि सीमाएँ संख्या ग्राहृय न होने के कािि इसे केवल व्यापक एवं अनंत की संज्ञा दी गई है। अस्स्तत्व कैसा है? यह स्पष्ट् होता है। वकतना है? यह स्पष्ट् नहीं होता। इसका मूल कािि यह है वक मनुष्य में अस्स्तत्व सवशस्व की आवश्यकता वसद्ध नहीं हो पाती है। फलतः उसके वलये प्रयास नहीं होता है. साथ ही मनुष्य के वलये अनुभव से अविक उदय होता है। अथाशत् अनुभव के आिाि पि अविक का अनुमान होता है। मनुष्य में, मनुष्य से एवं मनुष्य के वलये अनुभव ही प्रमाि पिम है। प्रयोग व व्यवहाि के मूल में भी अनुभव ही है। 8. रुपात्मक अस्स्तत्व अनेक इकाइयों का समूह है। प्रत्येक इकाई का वववभन्न स्तिीय ववकास अपेिाकृत अस्स्तत्व है। यही स्पष्ट्तः संख्या एवं संख्या का आिाि है। ववकास के क्रम में मनुष्य का अस्स्तत्व भी एक घटना है। प्रत्येक घटना में अपनी वविेर्ताएं होती हैं। इसी ताितम्य में मनुष्य में अपनी वविेर्ता के अनुसाि अथाशत ज्ञानावस्था के ववकास के अनुरुप पूिशतया दिशनिमता की संभावना है। इसी के आिाि पि अथश का सदुपयोग एवं सुििा का अविकाि मानव में, मानव से, एवं मानव के वलये सुिवित है। संभावनाओं को सफल बनाना ही अविकाि है। 9. मानवीयता मनुष्य की स्वभावगवत है। स्वभावगवत में उसके गुिात्मक परिवतशन का अविकाि व वनिन्तिता स्पष्ट् होती है। अवग्रम ववकास तब तक होता िहता है जब तक मनुष्य इकाई को सत्ता में अनुभव न हो जाय। यही ववकासपूिशता है। यही समािान एवं समािान ही वनिन्तिता है। स्वभावगवत में हस्तिेप से काम, क्रोि, लोभ, मोह, मद एवं मात्सयश उत्पन्न होता है, जो आवेवित गवत है। आवेवित गवत को सामान्य बनाने के वलये वाताविि का दबाव ही अनुिासन, सामान्य गवत को बनाये िखना ही िासन एवं उसकी वनिन्तिता ही प्रभुसत्ता अथवा प्रबुद्धतापूिश सत्ता है। यही वनपुिता, कुिलता एवं पांवडत्यपूिश संस्कृवत, सभ्यता, वववि एवं व्यवस्था है। पांवडत्य स्वयं में वववि है वजसके आिाि पि नीवत, कायश पद्धवत एवं ववर्य वस्तु का वनिाशिि एवं वनस्सिि होता है। न्यायान्याय, िमाशिमश, सत्यासत्य का ज्ञान ही पांवडत्य है। पांवडत्य मनुष्य के कायश व्यवहाि, आचिि, अभ्यास एवं ववकास का मूल स्त्रोत एवं लक्ष्य है। कुिलता एवं वनपुिशता, विष्ट्ता एवं व्यवसाय के आिाि एवं समृवद्ध के लक्ष्य है। पांवडत्य के अभाव में कुिलता एवं वनपुिता की उपयोवगता का ध्रुवीकिि नहीं हो पाता है। वनपुिता एवं कुिलता का अविकाि उपयोवगता एवं सुन्दिता मूल्य की सीमा में उपादेयी होता है। पांवडत्य में जीवन मूल्य अथवा स्थावपत मूल्यानुभव या प्रमाि िमता या अविकाि है। प्रमाविकता स्वतः सुख, िांवत, सन्तोर् एवं आनन्द है। यही मन, वृवत, वचत्त, बुवद्ध एवं आत्मा के संबंि में वनववशर्मता है। प्रमाविकता मनुष्य का अविकाि पिम है। मानवीयता पूिश पद्धवत से आचिि व व्यवहाि किने के वलये मनुष्य स्वतंत्र है। मनुष्य का मानवीयता पि स्वत्व होता है। स्वत्व, स्वतंत्रता एवं अविकाि का संयुि प्रकािन संस्कृवत, सभ्यता एवं िाष्ट्रीयता है। वजसका वववि में चरिताथश होना ही व जनवावदता एवं व्यवस्था में प्रभाविील होना ही क्रास्न्तकारिता है। ववकास की ओि जीवन की अबािगवत स्वतः क्रास्न्तकारिता एवं जनवावदता तथा जन्म की अभयता स्वयं में जनवावदता एवं उत्पादनीयता है। यही िाष्ट्रीयता की वनिन्तिता है।

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2. प्राचीन ज्ञान-तवज्ञान मध्यस्थ दर्शन, सह-अस्स्तत्ववाद व जीवन तवद्या

आज हम हि एक पहलुओं में पिाभव की ओि जा िहे हैं। हम आज वजतने सामथ्यशिाली हैं कल औि कम, आज वजतने सामावजक हैं, कल असामावजक, आज वजतनी व्यवस्था है कल औि कम व्यवस्था में पाते हैं। आज से कल बदति की ओि ही चल िहे हैं, अथाशत् यह कहें तो ठीक होगा की मानव सामावजक रूप में असामावजक, आवथशक रूप में ववपन्न एवं िाजनैवतक स्स्थवत में अंिकाि में चलते चला जा िहा है। िाजनैवतक ववफलता को द्रोह, ववद्रोह, िोर्ि औि युद्ध के रूप में हम देख पाते हैं। सामावजक रूप में जो हम देखते हैं वह अनेक जावत, पन्थ औि सामावजक चेतना कट्टिता की तिफ जा िही है। आवथशक रूप से आज वकसी एक को दो के साथ लाने का प्रयास किते हैं तो कल उसे 10 औि 2 के अनुपात में पाते हैं। 10 औि 2 को एक साथ लाने का प्रयत्न किते हैं तो 100 औि दस के अनुपात में हो गया। औि आगे बढ़े तो असमानता ही बढ़ी। इसके कािि में पाया गया वक व्यापाि चेतना औि नौकिी की चेतना मनुष्य को आवथशक असमानता की ओि दौड़ा िहा है। अनेक जावत, पंथ, सम्प्रदाय मनुष्य को कट्टिता की ओि दौड़ा िहा है। वजससे वदन प्रवतवदन मनुष्य जावत, भय व र्भ्ांवत की ओि जा िहा है।

मेिा मूल उद्देश्य दिशन को प्रस्तुत किना नहीं था, हमािा देि आज़ाद हुआ, सत्ता हस्तांतरित हुई। सत्ता पि अपने जन बैठे। जन प्रवतवनवि बने। हमािा संवविान िाष्ट्र चरित्र क्या है? इसे स्पष्ट् नहीं कि पाया, इस मूल तत्व से मुझे चोट लगी, वजज्ञासा जागृत हुई, यह जानने व समझने की वक िाष्ट्रीय चरित्र क्या है? अस्स्तत्व कैसा है? अस्स्तत्व में मानव कैसा है? मनुष्येत्ति प्रकृवत कैसी है? व्यवहाि में देखने लगा, एवं जब वाङ्गमय रूप देने लगा तो वह मध्यस्थ-दिशन बन गया, सह-अस्स्तत्ववाद हो गया। योजना बनने लगी। मेिी संवेदनिीलता कवहए या अनन्त की कृपा कवहए, वकसी योग या संयोग से ही वकसी तीसिी वस्तु का जन्म होता ही है। अनंत से हमािा संबंि है ही, इसे बाद में कहंगा| भाितीय संवविान में िाष्ट्रीय चरित्र पहचाना जा सकता है, यह ववश्वास उत्पन्न हुआ। एक भाग संविि रूप में पूिा हुआ।

दूसिा भाग -

मनुष्य अभी तक दो प्रकाि से घूमा - प्रथम तो ईश्वि को बीच में लाया। िहस्यमूलक ईश्विीय वचंतनज्ञान को हम ज्ञान मानते आये, इसके आिाि पि मनुष्य ईश्वि से सब कुछ होने की बात को माना, फलस्वरूप ईश्वि को केन्द्र मान कि हि बातों में हम सत्य को खोजने लगे। इसके वलये अनेकानेक ववभूवतयां अपने को प्रयोग वकये, अवपशत वकये, एवं ख्यावत भी पाये, वजन्हें हम आदिश पुरुर् मानते हैं। इससे दो प्रकाि का चरित्र का जन्म हुआ (वजन्हें आप भी श्रेष्ठ मानते हैं (1) भविवादी चरित्र (2) वविविवादी चरित्र। ये दोनों ही चरित्र वििा एवं व्यवस्था का आिाि या सूत्र नहीं बन पाये। फलस्वरूप ये व्यवि के सीमा में ही िह गया या व्यवि को वजतना भी संसाि, लोक, स्वयं श्रेष्ठ माना, इससे कहीं-कहीं तृवि वमलती िही। सवाशविक प्रयासों के बाद वजन महापुरुर्ों को हम पहचाने, समझे या माने उनसे हमें वििा औि व्यवस्था का कोई सूत्र नहीं वमला, औि िाष्ट्रीय चरित्र नहीं बन पाया।

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मानव अपने-अपने ढंग से प्रयास किता ही िहा, कोई न कोई पंथ, मत, संप्रदाय, जावत भार्ा, अपनी श्रेष्ठतानुसाि वकसी न वकसी पिम्पिा को अपनाये औि एक दूसिे के साथ टकिाने की जगह में आ गये। टकिाने की जगह में िहा ववज्ञान, ये इसी को घटा वदया। सभी अपनी-अपनी जगह जीते िहे, िांवत पूवशक भी अिास्न्त पूवशक भी। एक समुदाय दूसिे समुदाय से जब-जब वमला है या संबंि स्थावपत किने गया है तो टकिाहट ही वमली है। ये सब घटनायें वकसी न वकसी रूप में इवतहास में प्रकािान्ति से िखा ही है। इसके बाद जब हम दूसिी वववि से पहुँचे तो वस्तु को बीच में लाये, वजसे ववज्ञान युग कहा जा सकता है। वजसमें वस्तु को बीच में िख कि मनुष्य को चािों ओि घुमाया गया।

हम आवश्यकता से सुवविा, सुवविा से भोग, भोग से अवत-भोग व बहु-भोग की ओि चल वदये। यह भी सवशवववदत है वक भोग, अवत-भोग व बहु-भोग व्यविवादी होते हैं। यह समाज हो नहीं सकता, न समुदाय हो सकता है जब समुदाय ही नहीं तो समाज कहाँ से होगा। ये सािी बातें स्पष्ट् रूप में व प्रमाि रूप में सम्मुख िखा हुआ है ही।

अब इन दोनों को वमलाकि या वकसी एक को सवाशविक ले कि वििा में सस्म्मवलत कि वलया। अभी वििा में जो सवाशविक सस्म्मवलत है वह है वस्तु केंवद्रत ज्ञान। ईश्वि केस्न्द्रत ज्ञान बहुत न्यूनतम हो चुका है। इस अवस्था में आकि मनुष्य वदग्भ्र्भ्वमत, वदिाहीन एवं अवनश्चयता से कुंवठत पाया जा िहा है।

इन सबको देखने के बाद मैं जो लाया वह है अस्स्तत्व मूलक मानव केस्न्द्रत वचंतन ज्ञान- इसके अनुसाि जीवन अपने आप में स्पष्ट् होती है। जीवन जब स्पष्ट् हो सकता है तो मनुष्य, जीव, वनस्पवत व खवनज भी स्पष्ट् हो ही सकता है। खवनज संसाि की अपनी ही प्रवतष्ठा है। खवनज औि वनस्पवत एक आवतशनिील पद्धवत से अपने को वैभववत वकये हुये हैं। इसी भांवत मनुष्य का अन्य प्रकृवत के साथ आवतशनिील पद्धवत वैभववत होना एक सहज वक्रया है।

इस ढंग से मनुष्य जीवन औि ििीि का संयुि साकाि रूप में इस ििती पि वैभववत हुआ।

वतशमान की वििा में ििीि को ही अध्ययन किने का प्रयास वकया है फलस्वरूप मनुष्य ििीि को जीवन समझने लगा, ििीि को जीवन समझने से पिाभव ही हाथ आया। जीवन क्या है? स्पष्ट् किने को ही जीवन-ववद्या कहा गया है।

1.िहस्य मूलक ईश्वि केस्न्द्रत वचंतन ज्ञान

2.अवनश्चयता व अस्स्थिता वस्तु केस्न्द्रत वचंतन ज्ञान

अस्स्तत्वमूलक मानव-केस्न्द्रत वचंतन ज्ञान मध्यस्थ दिशन सह-अस्स्तत्ववाद इसमें से वनःसृत जीवन ज्ञान सहज रुप में वमलता है।

िहस्यमूलक ईश्वि-केस्न्द्रत ज्ञान औि अवनस्श्चतता अस्स्थितामूलक वस्तु-केस्न्द्रत वचंतन ज्ञान वििा औि व्यवस्था का आिाि नहीं हो सकता। इन दोनों को वमलाकि, घटाकि, काटकि या जोड़कि वििा औि व्यवस्था का आिाि नहीं बनाया जा सकता। वकसी गवत को आगे बढ़ाना है तो पीछे की गवत को ध्यान में िखना ही पड़ेगा, अन्यथा आगे की गवत नहीं हो पाती।

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एक बात पि ववचाि किें वक िहस्य की पृष्ठ-भूवम पि हम जो कुछ भी कहेंगे उसके मूल में यवद िहस्य ही है तो क्या स्पष्ट् होगा? वििा की वस्तु क्या होगी? वििा का वस्तु, ववश्लेर्ि औि प्रयोजन क्या है? वबना इन दोनों के वििा का कोई अथश नहीं है। वकसी भी वस्तु का आिाि जब िहस्य हो जाता है तो उस वस्तु से या िहस्य से कोई हम वाद- वववाद ववहीन सूत्र नहीं पा सकते। चूंवक प्रत्येक व्यवि में कल्पनािीलता औि वचंतन-िीलता सहज वतशमान है, यवद मैं िहस्य औि कल्पनािीलता से कुछ सूत्र वनकालता हँ तो आप दूसिा सूत्र वनकाल देंगे, तो वववाद होगा ही। वाद- वववाद का परििाम हम ववगत में भुगत चुके हैं। मेिा वनिशय, अनुभव व ज्ञान यही कहता है वक मनुष्य वििा अथवा व्यवस्था अथवा आचिि अथवा व्यवहाि अथवा व्यवसाय के आिाि पि जो भी सूत्र वनकालेगा वह अस्स्तत्व के आिाि पि होगा। अस्स्तत्व में जो है नहीं उसका कोई आिाि नहीं है। उसका कोई सूत्र भी नहीं है।

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3. सही बात को समझना

(*यह लेख नागिाजजी के कथन का श्रोता र्द्वािा प्रवतलेखन है)

मनुष्य को हमेिा सही बात को समझनी चावहए। ऐसे चाहत सवशमानव में ववद्यमान है।अगि वह गलत समझेगा तो वह हि मोड़ पि अथवा हि स्स्थवत पि गलती ही किेगा। वजस तिह एक गवित जब तक सही बात नहीं समझ लेता अथवा अंवकत किने का सही तिीका नहीं अपना ले, वह हि अंक गलत ही किेगा। गलत तिीके का उपयोग कि के कोई गवित वकसी भी अंक का सही उत्ति नहीं वनकाल सकता है।

पिन्तु यह वसफक गवित का ही प्रश्न नहीं, वकसी भी कलाकाि, व्यापािी, वकील अथवा गुिी ब्राह्मि के वलये भी यही वसद्धांत लागू होता है। हि मनुष्य एवं व्यवि के वलए यह लागू होता है। इस वसद्धांत के वलये कोई वनयवमत आयु सीमा भी नहीं। चाि वर्श का बालक भी यवद सही तिह से िब्दों का उच्ािि किना नहीं जानता है तो वह उस भार्ा की बोली सीख ही नहीं सकता। इस तिह यवद कोई सािु या तपस्वी अपने आप को सही तिह से पूजा-पाठ में लीन नहीं कि सकता वह कभी ईश्वि को प्राि कि ही नहीं सकता।

मेिे अनुसाि वसफक मनुष्य तक ही इस वसद्धांत को वनयवमत नहीं वकया जा सकता। क्या कोई िेि जंगल का िाजा होते हुए भी अन्य जानविों का विकाि कि सकता है यवद वह ऐसा किने का सही तिीका नहीं जानता हो ? अतः वसफक मनुष्य ही नहीं हि तिह के पिु-पिी, जन्तु-जानवि भी इस तिह के वसद्धांत को अपने साथ लेकि चलते हैं। एक पिी यवद अपना घोंसला नहीं बना सकता है तो वह ठण्ड एवं बिसात के मौसम में जी ही नहीं सकता।

एक औि बात है। यवद कोई ववद्याथी अपने पाठ का अध्ययन सही तिह से नहीं समझ लेता वह पिीिा में पास हो ही नहीं सकता। पिन्तु यवद वह एक बाि सही पाठ अपने वदमाग अपने वदमाग में जड़ से बैठा ले तो उसका फेल होना असम्भव है। अथवा जीवन में इस बात की यह महता है वक जब तक व्यवि सही चीज नहीं जान लेता , वह गलती किता ही िहेगा। जब तक वक उसके मन में सही बात नहीं आ जाती। अतः हि काम किने के वलए ऐसा किने का सही तिीका जानना महत्वपूिश ही नहीं आवश्यक है, जरूिी है।

सही की पहचा

सही चीज को पहचानना भी आवश्यक है। दो औि दो चाि होता है। तीन औि एक भी चाि होता है। यवद यह दोनों अंक आपस में जोड़े जाएं तो चाि के अलावा औि कुछ परििाम नहीं वमल सकता। इनके अलावा औि कोई अंक जोड़कि भी हम सही अंक प्राि नहीं कि सकते। यानी "चाि (सही) प्राि किने के वलये वसफक दो ही Formulae सही हैं। एक-तीन औि दो-दो। यह ठीक formulae हैं अथाशत् यह हमेिा सही यानी चाि (४) ही देंगे। यह मनुष्य के जीवन में भी जरूिी बात है न केवल गवितज्ञ के ववर्य। अथाशत् सही बात को पहचानना अथवा उसे अपने जीवन में प्रयोग किना जरूिी है ।

सुख के वलए केवल सुवविा पयाशि नहीं मनुष्य को अपने पेट भिने के वलये िोजी कमानी पड़ती है। इस कािि वह व्यापाि किता है या वकसी के यहाँ नौकिी किता है। ऐसा किने से मनुष्य को जो दौलत प्राि होता है उसे वह इकट्ठा किता है। उसका संग्रह किता है। वह ऐसा इसवलये किता है तावक वह इस कमाये गये दौलत का उपयोग कि सके। उपयोग भी उस तिह किें वजससे हम सुवविायें पा सकें। सुवविाओं के माध्यम से हमें सुख का कामना का होना स्पष्ट् अनुभव होता है। मगि क्या मनुष्य इन सुवविाओं से सुख का अनुभव वचि-काल के वलये कि सकता है? वनिंति?

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यवद एक व्यवि दस कमा लेता है तो उसे बीस कमाने की इच्छा होती है। जब वह बीस कमा लेता है तो सौ कमाने की इच्छा होती है।जब हजाि कमा लेता है तो लाखों की औि जब किोड़ कमा लेता है तो अिबों कमाने को उसका जी किता है। अतः मनुष्य की कामनाओं की कोई सीमा नहीं होती। संग्रह किके सुवविा उपलब्ि कि पाने की तृिी कभी उसे होती ही नहीं। अथवा मनुष्य कभी सुखी हो ही नहीं सकता।

स्वयं में भवश्वास

मनुष्य एक तिह का जीव होता है, प्रािी होता है। लड़ का.. लड़की... इनमें केवल ििीि ही नहीं औि भी कुछ होता है। जैसे ििीि है ििीि के अनेक अंि हैं। ऐसा कहा जाता है वक वदमाग “memory” का “store house” है। सजशिी से पता चलता है वक समस्त “brain” में ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ ज्ञान या बुवद्ध “store” वकया जा सके।

तो प्रश्न यह उठता है वक वदमाग काम कैसे किता है? अथाशत् “Storage” कहाँ होता है? अगि यही जीवन है, प्राि है तो यह चीज क्या है? यह पिमािु है। पिमािु का मतलब होता है “atom” "A constitutionally Saturated atom" is जीवन या प्राि कोि। यह प्राि कोि सप्रावित भी हो सकता है अथवा वनष्प्रावित भी। जो प्राि कोि साँस ले िहे होते हैं उन्हें सप्रावित कहते हैं। जो प्राि कोि सांस नहीं ले सकते हैं अथवा मृत हो जाते हैं उन्हें वनष्प्रावित प्राि कोि कहा जाता है।

अथाशत् वह यह जीवन ही है जो सोचने का काम किता है औि वजसके हमािे ििीि को छोड़कि चले जाने से कोई हमािे वनजीव ििीि को आश्रय भी नहीं देता। इस कािि जीवन बहुत ही महत्त्वपूिश है औि हमािे वलए इसे पहचानना भी अवतआवश्यक है ।

श्रेष्ठता का सम्मा

हम वजस समाज में िहते हैं उसमें अनेक प्रकाि के लोग हमािे साथ वनवास किते हैं। इनमें से कुछ लोग ज्ञान के िेत्र में हम से ज्यादा ज्ञानाजशन कि चुके होते हैं। ऐसे लोगों के प्रवत वजनका ज्ञान हमािे से ज्यादा होता है उनके प्रवत हमािे मन में सम्मान उत्पन्न होते हैं एवं हम उनका सम्मान किते हैं।

पिन्तु ऐसे लोगों की पहचान कैसे की जा सकती है? यवद कोई आदमी अपनी वडवग्रयों के बािे में बताये औि प्रमाि दें तो क्या इस ववचाि से हम उन व्यवियों का सम्मान किना प्रािम्भ किते हैं? नहीं। वकसी के ज्ञान का अंदाजा लगाना अथवा इस कािि पि उनका सम्मान कि पाने के वलए उनके साथ जीना अवतआवश्यक है। तावक हम उनकी महानता को पहचान सकें। इस कािि हम व्यवस्था में िहते हैं। व्यवस्थायें कई प्रकाि के होते है: परिवाि व्यवस्था, ग्राम व्यवस्था, वजला व्यवस्था, प्रदेि व्यवस्था एवं देि व्यवस्था। सब से छोटा है परिवाि व्यवस्था। परिवाि व्यवस्था में हम अपने माता-वपता, भाई-बहन के साथ िहते हैं। इस से हम तीन चीज सीखते हैं :

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1.आहाि (खाद्य).

2.व्यवहाि (बताशव)

3.ववहाि

इसका मतलब है एक दूसिे के प्रवत मनोभाव | परिवाि में िहते हुए हम एक दूसिे के साथ खेलते हैं, हँसते हैं, िोते हैं, बातें किते हैं तो एक दूसिे के प्रवत अपने मनोभाव प्रकट किते हैं। भववष्य में इसी से सम्मान बन आता है।

पिन्तु हमें वसफक परिवाि व्यवस्था तक ही सीवमत नही िहना चावहये। हमें ग्राम, वजला एवं देि के स्ति पि भी ववकास की जो योजनाएँ बनाई जा िही हैं उसमें अपना पूिा योगदान देना चावहये। इस तिह व्यवस्था में िहने से हमािी प्रवतभा औि व्यवित्व दोनों ही फूलते-फलते हैं।

आहार

हि जीव का अपना एक वनस्श्चत आहाि होता है। जैसे झाड़-पत्तों के, गाय के वलए घास-फूूँस, िेि-बाघ जैसे मांसाहािी जानविों के वलये अन्य छोटे जानविों की हत्या की जाती है।

मनुष्य ने ववज्ञान के ववर्य में बहुत प्रगवत वकया है, ववकासिील हुए हैं। अपने देि को उन्नवत के मोड़ पि चढ़ाया है। पिन्तु अपना आहाि अभी तक कोई decide नहीं कि पाए हैं। कोई िाकाहािी है तो कोई मांसाहािी।

तो यह देखना चावहये वक मनुष्य/मानव की ििीि िचना कैसी है? इसके वलये पहले हमें मांसाहािी एवं िाकाहािी जानविों के बीच में अन्तिों का अध्ययन कि लेना चावहये। मांसाहािी जीवों के दाँत एवं नाखून लम्बे औि नुकीले होते हैं तावक वे मांस को तान-काट सके।

िाकाहािी जीवों के दाँत - नाखून ऐसे नहीं होते। मांसाहािी जीव हमेिा जीभ से पानी पीते हैं (e.g. कुत्ता)। िाकाहािी जीव होठों से पानी पीते हैं। मांसाहािी जीवों के आंत छोटी होती है, िाकाहािी जीवों की आंत बड़ी होती है।

अध्ययन वकये जाने पि समझा गया है वक मनुष्य में सािे िाकाहिी गुि हैं जहां तक ििीि िचना का सवाल है। मनुष्य के दाँत नाखून लम्बे नहीं होते, आंत बड़ी होती है औि वह होठ से पानी पीते हैं। इस कािि सािािितः मनुष्य को िाकाहिी होना चावहए। पिन्तु मनुष्य अभी तक इसका वनिशय नहीं कि पाया है।

वैसे देखा जाये तो मनुष्य वजतना भी अपने आप को अवहंसा के पथ पि कहे, मांसाहािी मनुष्य वहंसा किता है क्योंवक उसके भोजन के वलये अन्य जीवों की हत्या की जाती है। अतः मांसाहािी मनुष्य वहंसा का द्योतक है ।

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व्यवहार

परिवाि व्यवस्था में िहने के साथ-साथ हम एक दूसिे के भावों औि व्यवित्वों को समझते हैं औि उनसे जैसे बताशव एवं व्यवहाि किते हैं। हम सब एक साथ त्यौहाि मनाते हैं औि एक दूसिे को वस्तुएँ आवद समपशि एवं अपशि किते हैं। समपशि औि अपशि में अंति होता है। समपशि किना उस भेंट को कहते हैं जो हम वापस नहीं चाहते। जो हम एक साथ मनाये गये पवश, त्यौहाि में किते हैं। समपशि किने के भाव भी िुद्ध एवं स्पष्ट् होने चावहये। वसफक देने का एक वनयम इसवलये नहीं। बस्ल्क पूिे वदल से देना चावहये।

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मानव

1. मानव जीवन एवं जीवनी-क्रम

मनुष्य का जीवन मानवीयता की सीमा जीवनमूलक पद्धवत से आिंभ होता है, वचंतन-समुच्य भौवतक ववचाििािा पि आिारित हो या आध्यास्त्मक ववचाििािा पि, इस बात को स्पष्ट् किने में उत्साह यह प्रकट होता है वक मानव में एक मानवीयता की वनस्श्चत, स्पष्ट् एवं अपरिहायश सीमा को उभािने हेतु सभी सुहृद एवं आि पुरुर्ों का साम्य प्रयास पाया जाता है। इस ववर्य में उनके र्द्वािा वकया गया यह अथक प्रयास इवतहास के अवलोकन में भी वसद्ध होता है। अब तक उसे प्राि किने में हम असमथश िहे हैं, वफि भी पाने के वलए प्रत्यािी एवं प्रयासोन्मुख हैं। इस मौवलक वबंदु के संदभश में वििा प्रदान किने के वलए मध्यस्थ दिशन अपने में परिपूिश होकि लोक सम्मुख उपस्स्थत हुआ है, जो 4 भागों में प्रिीत है : यथा

1.मानव व्यवहाि दिशन

2.मानव कमश दिशन

3.मानव अभ्यास दिशन

4.मानव अनुभव दिशन।

मध्यस्थ दिशन समग्रता, ववकास व व्यवहाि के प्रवत वकसी िहस्य र्द्वंर्द्व संघर्श चेतना को मनुष्य के अववकवसत चेतना वनरूवपत किता है साथ ही मानव को गुिात्मक ववकास क्रम में मानवीयता पूिश संचेतना में संक्रवमत होने का वनस्श्चत पद्धवत को सुलभ वकया है। र्द्वंर्द्व को अनुभव व्यव्हाि में व समािान में अध्ययन संस्काि सुलभ किने का पाठ औि वकसी िहस्य को िहने नहीं देता औि साथ ही समग्र के संबंि में यह बताता है वक सत्ता व्यापक है तथा इसमें ही समग्र प्रकृवत समाई हुई है, फलतः प्रकृवत ऊजाशमय है।

इसवलए प्रकृवत प्रत्येक स्ति में वक्रयािील वसद्ध हुई है, चाहे वह बड़े से बड़े गृह गोलावद हो अथवा छोटे से छोटा अिु पिमािु या अंि ही क्यों ना हो। यही वस्तुगत सत्य है। इस सत्यता से चेतना से पदाथश या पदाथश से चेतना को वनष्पन्न किाने का कष्ट् दूि हो गया है। मध्यस्थ दिशन प्रकृवत को जड़ औि चैतन्य दो भागों में स्पष्ट् किता है। जड़ प्रकृवत पदाथाशवस्था एवं प्रािावस्था में तथा चैतन्य प्रकृवत जीवावस्था एवं ज्ञानावस्था में दृष्ट्व्य है। ज्ञानावस्था के मनुष्य को परिभावर्त किते हुए मानव जनजावत को आत्मवनिीिि किने के वलए बाध्य वकया गया है। “मनाकाि को साकाि किने एवं मनः स्वस्थता के आिावादी” को मानव संज्ञा दी गई है। हम देखते हैं वक प्रत्येक मनुष्य अपनी आिा, इच्छा एवं ववचािानुरूप ही प्राकृवतक ऐश्वयश पि उपयोवगता एवं कला की प्रस्थापना किता है। यही मनाकाि को साकाि किने का तात्पयश है। प्रत्येक मनुष्य सुखी होना चाहता है, सुख, िांवत, संतोर् एवं आनंवदत होना चाहता है, जो वनववशवाद सत्य है। यही मनः स्वस्थता के आिावादी का अथश है।

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इस प्रकाि मनाकाि को साकाि किता हुआ, मन: स्वस्थता का आिावादी ओतप्रोत मानव जावत को असंवदग्भ्ि रूप में देखा जा िहा है| इसमें मावमशक वबंदु यही है की उपिोि वववेचन के अभाववि न्याय का ध्रुवीकिि आज तक नहीं हो पाया।

मध्यस्थ दिशन ने न्याय वक ध्रुवीकिि में यह घोर्िा की है, की मानवीयता की अवभव्यवि जो विष्ट्ता के रूप में प्रकावित होता है वजसके वनवाशह मानवीय सम्बन्ि मूल्यों पि आिारित है। नीवत से समाज में, ववश्व में िास्न्त तथा अंतिाशष्ट्रीय में सामंजस्य संभव बनाया जा सकता है। इस स्स्थवत में मध्यस्थ दिशन एक मागशदिशक के रूप में उपलब्ि है। यह उपलस्ब्ि मानव में पाई जाने वाली वचिकालीन वांछा, आकांिा एवं पूिश तृर्ा की पूवतश के वलए परिपूिश एवं परिहायश है।

मध्यस्थ दिशन में प्रकृवत में पाई जाने वाले वक्रया एवं जीवन के संबंि में पदाथाशवस्था को अस्स्तत्व सवहत संघर्ाशत्मक जीवन तथा प्रािावस्था को अस्स्तत्व संघर्श सवहत पुष्ट्यात्मक प्रवक्रया में ित जीवन बताया है। जीवन मात्र को आिावादी जीवन के स्वरूप में स्पष्ट् किते हुए उसकी सत्यता को जीवन की आिा से सम्पन्न बताया है। मनुष्य को बुवद्धजीवी बताते हुए बौवद्धकता की सत्यता को दो परिप्रेक्ष्यों में स्पष्ट् वकया गया है- 1) ववज्ञान औि 2) वववेक। मध्यस्थ दिशन ने बौवद्धकता की परिपूिशता को वववेक औि ववज्ञान की सीमा में वनपुिता, कुिलता एवं पास्ण्डत्य के समग्रता को बताया है, औि साथ ही यह भी स्पष्ट् वकया है वक वववेक के वबना ववज्ञान, ववज्ञान के वबना वववेक जीवन की अपूिशता के द्योतक हैं। मानव की बौवद्धकता को पूिशतया चैतन्य पि की िमता, योग्भ्यता एवं पात्रता बताते हुए प्रमािों सवहत यह बताया गया है वक िासायवनक सीमा के अवतरिि यह सीमा गठन की पूिशता के अनंति ववकासपूवशक पाई गई एक अहशता है। इससे स्पष्ट् हो जाता है की मनुष्य बुवद्धजीवी है, ना वक िासायवनक। इस स्पष्ट् तथ्य को सवश सुलभ किने की व्यवस्था मध्यस्थ दिशन ने कि दी है।

मानव जीवनीक्रम के संदभश में मध्यस्थ दिशन ने इस वस्तुगत सत्यता को उद्घावटत वकया है वक मनुष्य के वजतने भी संबंि एवं संपकक हैं, उन सभी की पिस्पिता में स्थावपत मूल्य हैं, जो स्स्थवत है। उसका यह उद्घोर् िाजनैवतक एवं िमश नैवतक पिों एवं पिििों का ध्यान आकवर्शत किता है औि मानवीयता की सीमा में “मानव जावत एक, कमश अनेक” की सुदृढ़ स्स्थवत को पाने की संभावना प्रकट किता है एवं उसके वलए आवश्यकीय परिपूिश वििा प्रदान किता है। मनुष्य में पाएजाने वाले चािों आयाम तथा मनुष्य की पाँचों स्स्थवतयाँ (व्यवि, परिवाि, समाज िासन एवं अंतिाशष्ट्र) के जीवनीक्रम में मध्यस्थ जीवनीक्रम की स्पष्ट्ता को उद्घावटत किता है।

अब तक हम मनुष्य की पिस्पिता में स्थावपत मूल्यों औि उसकी स्स्थिता के संबंि में एक िहस्यता अथवा वैववध्यता को अवनवायश या अपरिहायश सम्म समझते आये हैं, वजसका स्पष्ट् प्रमाि यह है वक मानव जन अनेक जावतयों में ववघवटत पाए जा िहे हैं, फलतः हम युद्धोन्मुखी हो गए हैं। यही कािि है वक प्रत्येक िाष्ट्र एवं देि युद्ध िवि का संचय किने में वववि हो गया है। इसका मूल कािि मनुष्य के पिस्पि संबंिों में वनवहत स्थावपत मूल्यों की अविष्ट्ता ही है। सुदूि ववगत के अथक प्रयासों की यह असफलता स्वयं में स्पष्ट् है, जो अनेक खंडों में बंटी हुई है। इससे मुवि पाने के हेतु मध्यस्थ दिशन सप्रमाि घोर्िा किता है वक “मानव जावत एक कमश अनेक”, “मानव िमश एक मत अनेक”, “भूवम एक िाष्ट्र अनेक” तथा "ईश्वि एक देवता अनेक” है। इन मूल अविाििाओं के सुदृढ़ आिाि पि ही मानव अपने

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